SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 46
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३९ बनवाया हुआ भगवान् श्रीनेमिनाथ प्रभु का जिना - लय भी बड़ा मनोरम है । इसके दहिने तरफ सप्तखण्डा भूमिगृह है। कहा जाता है कि तपागच्छीय श्रीमानदेवसूरिजीने इसी भूमिगृह में विराजमान हो कर सप्रभावक 'लघुशान्तिस्तव' की रचना की थी जिसके पाठ करने और तन्मंत्रित जल - सिंचन से शाकम्भरी संघ में प्रचलित महामारी रोग मिट गया था । तीसरा श्रीऋषभदेव - प्रभु का शिखरबद्ध और चौथा श्रीपार्श्वनाथ- प्रभु का घर देरासर जिनमें तीन तीन प्रतिमायें प्रतिष्ठित हैं । यहाँ के पतित खण्डहरों तथा पतितावशिष्ट वापिकाओं से पता लगता है कि किसी समय यह समृद्ध नगर होगा । ३ श्री नाडलाई - तीर्थ द्वितीया को श्रीसंघ नाडलाई पहुंचा, और सस्वागत उसने नगर में प्रवेश किया । नाडलाई का शुद्ध एवं प्राचीन नाम नारदपुरी है, नाडलाई यह १ एकत्र तत्र पृथिवीं प्रविलोक्य पृथ्वीं. सोऽवीवसन्नगरमृद्धिमयं स्वनाम्ना । भुव्यत्र नारदपुरीति पुरी गरीयः, श्रीस्तैलबिन्दुरिव पाथसि पप्रथे सा ॥ २६ ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034961
Book TitleMeri Golwad Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherDevchandji Pukhrajji Sanghvi
Publication Year1944
Total Pages110
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy