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________________ महावीर-वचनामृत समिच्च लोयं समया महेसी, प्रायाणुरक्खी चरमप्पमत्ते ॥ (उत्तराध्ययन ४.१०) अर्थ-विवेक कुछ झटपट नहीं प्राप्त किया जाता, उस के लिये कठोर साधना की आवश्यकता है। अतएव महर्षि जन आलस्य त्यागकर, कामभोगों का परित्यागकर, संसार का ठीक-ठीक स्वरूप समझकर, आत्मा की रक्षा करते हुए अप्रमादपूर्वक आचरण करते हैं। १२ उवउझिय मित्तबंधवं, विउलं चेव धणोहसंचयं । मा तं विइयं गवेसए, समयं गोयम ! मा. पमायए ॥ (उत्तराध्ययन १०.३०) अर्थ-एक बार विपुल धनराशि तथा मित्र-बान्धवों का त्यागकर फिर उन की ओर मुंह मोड़कर मत देख । हे गौतम ! क्षणमात्र भी प्रमाद न कर। १३ से सुपडिबद्धं सूवणीयं ति नच्चा पुरिसा परमचक्खू विपरिक्कमा, एएसु चेव बंभचेरं ति बेमि, से सुयं . च मे अज्झत्ययं च मे बंधपमुक्खो अज्झत्येव । (आचारांग ५.२.१५१) अर्थ-मैंने सुना है, अनुभव किया है कि बन्धन से मुक्त होना यह अपने हाथ में है, अतएव हे परमचक्षुमान् पुरुष ! ज्ञानी पुरुषों से ज्ञान प्राप्त करके, तू पराक्रम कर; इसी का नाम ब्रह्मचर्य है, यह मैं कहता हूँ। १४ चीराजिणं नगिणिणं, जडी संघाडि मुंडिणं एयाणि वि न तायंति, दुस्सीलं परियागयं (उत्तराध्ययन ५.२१) Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034954
Book TitleMahavir Vardhaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagdishchandra Jain
PublisherVishvavani Karyalay
Publication Year1945
Total Pages70
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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