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________________ ३४ महावीर वर्धमान एक दिन अपनी आँख फोड़ डाली । ब्राह्मण आया और यथावत् पूजा, सत्कार करके चला गया । थोड़ी देर बाद भील आया । उस ने शिव जी की एक आँख ग़ायब देखकर झट अपनी आँख निकालकर उन के लगा दी । जब ब्राह्मण को पता लगा तो उस की समझ में आया कि क्यों शिव जी भील .को चाहते हैं ।" यह लौकिक उदाहरण यद्यपि भक्ति और मान की उत्कृष्टता प्रदर्शित करने के लिये दिया गया है लेकिन इस से पता लगता है कि जैनधर्म में ऊँच-नीच तथा निरर्थक बाह्याडंबर के लिये कोई स्थान नहीं था । मनुष्य अपने कर्म से, अपने गुण से और अपनी मेहनत से ही उच्च पद प्राप्त कर सकता है, न कोई ऊँचा है न कोई नीचा, यह महावीर का अलौकिक संदेश था । ७ स्त्रियों का उच्च स्थान स्त्री के विषय में महावीर बहुत उदार थे । उस युग में स्त्रियों की बड़ी दुर्दशा थी। कोई उन्हें मायावी कहता था, कोई कृतघ्न कहता था, कोई चंचल कहता था, कोई कामाग्नि से धधकती हुई अग्नि कहता था, और कोई नरक की खान बताता था । स्मृतिकारों ने कहा है कि स्त्री को किसी भी अवस्था में स्वतंत्र न रहने देना चाहिये । बुद्धदेव जैसे जीवन के कलाकार उपदेशक के सामने जव स्त्री-दीक्षा का प्रश्न आया तो उन्हें इस विषय पर काफ़ी विचार करना पड़ा। पहले तो उन्होंने भिक्षुणी को अपने संघ में स्थान देने से इन्कार कर दिया, परन्तु अपनी मौसी महाप्रजापति गौतमी के बहुत आग्रह करने पर उन्हों ने उसे संघ में दाखिल किया, ५३ यद्यपि आगे चलकर ५२ 'बृहत्कल्प भाष्य पीठिका पृ० २५३ चुलवग्ग १०.१ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com ५३
SR No.034954
Book TitleMahavir Vardhaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagdishchandra Jain
PublisherVishvavani Karyalay
Publication Year1945
Total Pages70
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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