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________________ प्रभावसे सर्वमक्षी हो रहा है " परोपकारः पुण्याय" यह सनातन पथ मुख्य तया हमारे लिये ही है | अन्तमें आप निभींकावस्थासे उसी रास्ते होकर चण्डकौशिकके बिल पर जा खडे हुए । सर्प मनुष्यका आमा देखकर क्रुद्ध हुआ और बिलसे बहिर निकल कर सोचने लगा | अरे ! जहाँ मेरे भयसे आकाशमार्ग भी बन्द हो रहा है वहाँ यह मनुष्य ! स्रो मी मेरे द्वार पर !! - बस कहना ही क्या था ? एक तो सर्प और वह भी दृष्टिविष । पहिले तो उसने लाल आँखें करके प्रभुपर आँखोंका जहर छोडना शुरू किया । और जब इस क्रियासे थक गया, तब महावीर प्रमुके चरण पर डंक मारा । भगवद्देव उस दुःखसे जराभी दुःखी नहीं हुए, जरा नहीं घबराए । सत्य कहा है “ कल्पान्तकालमरुता चलिताचलेन किं मन्दराद्रि शिखरं चलितं कदाचित् ? | " परिणाम यह हुआ कि उस उत्कटरोषी महा अपराधी सर्पको परमेश्वरने शान्त किया । जमवत्सल प्रमुके प्रभावसे उसे जन्मान्तरका ज्ञान हुआ । परमात्माके समक्ष पन्द्रह दिनकी महा तपस्या करके प्रभुके सुधामय उपदेशको सुनकर वहक्रूर काय सर्प १५ दिन के पश्चात् इस रौद्र शरीरका त्याग कर आठवें देवलोक में पहुंचा। " सिक्तः कृपासुधा वृष्ट्या, वृष्ट्या भगवतोरगः । पक्षान्ते पञ्चतां प्राप्य; सहसारदिवं ययौ ।। १ ।।" (त्रिशष्ठिश पु. च.) पूज्य-पूजक समाज. प्रमुकी हयाती में अठारह देशके राजा जैनधर्म के प्रतिपालक थे। श्री महावीर प्रमुके मामा चेटक (चेडाराजा ) जो कि विशाला नगरीके ____ * “ अवश्यं चैष बोधाई इति बुद्धया जगद्गुरुः । आत्मपीडा मगणय न्नृजुनैव पथा ययौ ॥१॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034952
Book TitleMahavir Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmatilak Granth Society
Publication Year1922
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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