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________________ ( १४ ) उपकेशवंशगच्छे श्रीरत्नप्रभसूरिः, येन उसियनगरे कोरंटनगरे च समकालं प्रतिष्ठा कृता, रूपद्वयकरणेन चमत्कारश्च दर्शितः । --उपकेशवंशगच्छीय श्रीरत्नप्रभाचार्य हुए जिन्होंने ओसिया और कोरंटक (कोरटा) नगर में एक ही लग्न में प्रतिष्टा की और दो रूप करके चमत्कार दिखलाया। रत्नप्रभसूरि-पूजामें लिखा है किमहावीर-निर्वाणथी, वर्ष सप्तति जाय । शुभ कोरंटक तीर्थनी, तदा प्रतिष्ठा थाय ॥?" रत्नप्रभसूरीश्वरे, स्थाप्युं तीरथ एह । पार्श्वनाथ संतानमां, छट्ठा पाटे जेह ॥२॥ विद्याधर कुलनभमणि, रत्नप्रभसूरीश । एक लग्नमां तीर्थ दोय, जेह प्रतिष्ठा करीश ॥३॥ ओसिया ने कोरटा, प्राचीन तीर्थ गणाय । यात्रा करतां भविजना, सफल करे निज काय ॥४॥ जैनधर्मविषयक-प्रश्नोत्तर के पृष्ठ ८१ में आत्माराम (विजयानन्दसूरि) जी लिखते हैं कि " एरनपुरा की छावनी से ३ कोश के लगभग कोरंट नामा नगर ऊजड पड़ा है जिस Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034926
Book TitleKortaji Tirth ka Itihas Sachitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYatindravijay
PublisherSankalchand Kisnaji
Publication Year1930
Total Pages138
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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