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________________ ८० ] [ जिनप्रभसूरि अने अने क्रमथी द्रव्यव्ययनां स्थानो जाणनारा आ पृथ्वीधरे उज्ज्वल ८४ चैत्यो कराव्यां हतां. श्रेष्ठ उदार धीर अचिन्त्य चरितोवडे तेणे लांबा काळ पर थइ गयेला, हरिषेण चक्रवर्ती, संप्रति अने कुमारपाळ राजानुं स्मरण करावयुं हर्तु. मुक्तिलक्ष्मीथी संयुक्त जिन - नायकोथी विभूषित थयेला ये विहारो ( जिनमंदिरो ), भूमिरूपी भामिनीना हृदय पर रहेला मोतीना हारो जेवा शोभे छे. ' कोटाकोटि ' एवा नामथी प्रसिद्ध महिमावाळो अने शांतिनो शत्रुंजय पर, तथा 'पृथ्वीधर ' एवी संज्ञावडे सुरगिरि(देवगिरि - दोलताबाद) मां अने मंडपाद्रि (मांडवगढ) मां अने पृथ्वी पर नगरो, गामो विगेरेमां रहेला तेना बीजा पण घणा ऊंचा प्रासादो मुक्तिरूपी वलभी पर चडवाने नीसरमीना दंड जेवा शोभे छे. पृथ्वीधरशाहे करावेला प्रासादोना स्थानोनी संख्या अने मूलनायक जिनोनां नामो विगेरे वक्तव्य, पूज्य गुरु सोमतिलकसूरिजीए करेलुं स्तोत्र, अहिं उतारीने पठन करं जोइए; ते आ प्रमाणे छे " दीन विगेरेने सुविधिपूर्वक उत्कृष्ट दान आपनार, जयसिंह राजा प्रत्ये भक्तिवाळा, पोतानुं औचित्य साचवनार, अर्हन्तोनी भक्तिथी पुष्ट, गुरुना चरण सेवनार, मिथ्यामतिने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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