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________________ ६४ ] [ जिनप्रभसूरि अने प्रभसूरि हता, तेमने मळवा माटे सूरिजी ( जिनप्रभ ) नगरमां गया. त्यां सोमप्रभमूरिजीथी अभ्युत्थान, आसन विगेरे द्वारा बहु मानित थयेला जिनप्रभसूरि तेमना प्रत्ये बोल्या के - 'तमे आराध्य छो, के जेमनी आवा प्रकारनी क्रिया छे. ' तेओ ( सोमप्रभरि ) पण प्रत्युत्तररूपे बोल्या के -' प्रभो ! अमारी प्रशंसा शी करवानी होय ?, तमे धन्य छो, के जेना आधारे जिन - शासन जागे छे. ' ए प्रमाणे प्रीतिपूर्वक ते बंने आचार्यो ज्यारे परस्पर वात करता हता, तेत्रामां शालामां जे कौतुक थयुं ते कहेवामां आवे छे' एक साधुनी सिक्किका ( सीकली ) ने उंदरे विनष्ट करी हती, ते मुनिए गुरुजीनी आगळ आवीने राव करी. ते वखते जिनप्रभसूरिजीए विद्याओवडे आकर्षेला, शालानी अंदरना सर्व उदरो उपस्थित थया. म्हों ऊंचेथी नमावी, बे हाथ (आग - ळना बे पग ) जोडी भय-भीरु ते उंदरो विनीत शिष्योनी जेम गुरुजीनी आगळ ऊभा रह्या. [जिनप्रभसूरिजीए कह्युं के ] ' हे उदरो ! सांभळो, जे कोइ अपराधी ( गुन्हेगार ) होय, ते रहो अने बीजा बधा जाव, स्वेच्छापूर्वक हरो-फरो. 'ए प्रमाणे आचार्य ( जिनप्रभसूरि ) ना वचनने सांभळी सघळा उदरो त्वराथी पग उपाडता कूदीने गया अने एक तो चोरनी जेम आगळ रह्यो. सूरीन्द्रे तेने पण कहां के -' डर नहि, धीरता धारण कर. अमे साधुओ छीए, कोइने पण पीडा करता नथी. ' Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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