SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 16
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सुलतान महम्मद. ] स्पष्टता न होवाथी निश्चितरूपमां कही शकाय तेम नथी के-ए मंजरीमा सौरभ प्रकट करवामां प्रस्तुत जिनप्रभसूरिनी ज सहायता होय, मात्र समान समयने तथा नाम-साम्यने लईने तेमनी संभावना करवामां आवे छे. आ जिनप्रभसूरिए रचेली कृतियोमा प्रथम जणाती कातंत्रविभ्रम ग्रंथनी टीका छे. तेमां विद्वत्ता अने सूचव्या प्रमाणे ए रचना वि. सं. विहार-स्थळो १३५२ मां योगिनीपुर( दिल्ली )मां माथुरवंशीय ठक्कुरकुलीन कायस्थ खेतलनी अभ्यर्थनाथी थई हती. व्याकरणविषयक २६१ श्लोकप्रमाण आ वृत्तिनी प्रति, जेसलमेरना जैन भंडारमा 'छे. आ टीकाना अंतमां पोताने 'अप्रौढधीः ' विशेषण आप्यु छ. ए पोतानी वयविषयक लघुता सूचववा वापर्यु होय एवी कल्पना करीए तो पण ते वखते तेमनुं वय वीशेक वर्षतुं कल्पी शकाय; कारण के एज टीकाना अंतमा 'मूरि' पद साथे पोताना नामनो निर्देश कर्यो छे. विभ्रम उपजावनार व्याकरणविषयक १. गायकवाड ऑरिएन्टल सिरीझ नं. २१ मां प्रकाशित थयेल 'जेसलमेर भाण्डागारीय प्रन्थसूची' [पृ. ४८-४९] मां तथा तेना · अप्रसिद्धग्रन्थ-ग्रन्थकृत्परिचय' [पृ. ५८] मां अम्हे आ ग्रन्थ साथे ग्रन्थकारनो संस्कृतमा संक्षेपमा परिचय कराव्यो छे. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy