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________________ ___१४२ ] जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने हता, राघवचैतन्य विगेरे कथा-विनोद करता हता.राघवचैतन्ये दुष्ट स्वभावथी चिंतव्यु के-' आ जिनप्रभसरिने दोषवंत करीने आ स्थानमांथी अटकावू-कढावू.' एवो विचार करी तेणे विद्याना बलथी शाहना हाथमांथी मुद्रारत्न( वींटी )नुं अपहरण करीने सूरि न जाणे तेवी रीते जिनप्रभसूरिना रजोहरण( धर्मध्वज ओघा )मां नाखी दीधुं. पद्मावतीए सूरिने निवेदित कयु के'तम्हने चोर बनाववानी इच्छाथी राघवचैतन्ये शाहनी पासे. थी मुद्रारत्ननु अपहरण करी तम्हारा रजोहरणमां नाखेल छे. तमो " श्रीमद्राघवचैतन्यमुनिना ब्रह्मवादिना । [स्तव रत्नावली सेयं ज्वालामुख्यै समर्पिता ॥" ' श्रीमत्साहिमहम्मदस्य जयतात् कीर्तिः परा योगिनी ।' नि. सा. नी काव्यमालाना प्रथम गुच्छकना प्रारंभमां मूका. येल मंत्रमालागर्भित महागणपतिस्तोत्रना कर्ता पण आ कवि जणाय छे. तेनी व्याख्या-टिप्पणीमां तेने ' परमहंस परिव्राजका. चार्य' विशेषणथी परिचित कराव्या छे. शार्ङ्गधरे शाङ्गधरपद्धति (सुभाषितावली)मां केटलांक पद्यो ' श्रीराघवचैतन्यश्रीचरणानां ' उल्लेख साथे सूचवेलां छे, तथा शाकम्भरीश्वर हम्मीर चाहुवाण( चौहाण )नी राजसभाने शोभावनार द्विजाग्रणी राघवदेवना पौत्र तरीके पोतानो परिचय कराव्यो छे. एथी ए राघवदेव ज संन्यासी थया पछी राघव चैतन्य नामे प्रसिद्ध थया हशे-एम जणाय छे. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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