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________________ सुलतान महम्मद ] जिन प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ८९ - आश्चर्यकारक रीते करतो हतो. श्रेष्ठ उदार समग्र सद्गुणोवाळो, सदा ६ आवश्यकोमां तत्पर, अर्हद्-गुरु-भक्त, मत - प्रभावक ते ( पृथ्वीधर=पेथड ) पृथ्वीना अलंकाररूप थइ गयो. " [ मुनिसुंदरसूरिनी सं. गुर्वावली श्लो० २०२थी २१२] देवगिरिमां जिन - प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? पं. रत्नमंडनगणिए विक्रमनी १६ मी सदीमां रचेला पेथडशाहना ऐतिहासिक प्रबंधरूप सुकृतसागर नामना मंडनांक सं. काव्य ( चतुर्थ तरंग) मां सूचयुं छे के “ ते प्रासादोमां, देवगिरिपुरमां एक दिव्य प्रासाद, जे री बन्यो, ते प्रबंध जाणवा योग्य छे " हाथीओनी मद - वृष्टिनी सुगंधथी बहेकता मुख्य द्वार - वाळं, घणा सुवर्णथी सार्थक नाम धरावतुं देवगिरि ( देवोनो पर्वत स्वर्णगिरि = मेरु)पुर छे. प्राकार ( किल्लो), परिखा (खाइ ) अने आराम ( उद्यानो) नी पंक्तिओथी परिवेष्टित थयेला श्रीबीज जेवा जे नगरने शत्रुओ एकतानवाळा थइ संभारे (ध्यानमां धरे ) छे. ते नगरमां ध्वनि करतां बार हजार वाद्योद्वारा शत्रुओने त्रास पमाडनार, संग्रामनी शोभाना प्रयोजनरूप थयेल शस्त्र विगेरेनी सामग्रीवाळो, तथा १ मोतीनी जोड, २ चित्तने चोरनार स्त्री, ३ कष्टभंजन घोडो अने ४ बावनाचंदन ए चार रत्नोवाळो, ५६ करोड सोनैयावाळो, ८०००० एंशी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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