________________ (66) आलोचना पाठ दोहा बन्दो पांचों परमगुरु, चौबीसों जिनराज / करूं शुद्ध आलोचना, शुद्धि करन के काज // चाल छन्द सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अतिभारी। तिनकी अब निवृति काज, तुम शरण लही जिनराज // इक वे ते चउ इन्द्री वा, मन रहित सहित जे जीवा / तिनकी नहिं करुणा धारी, निर्दय है घात विचारी॥ ममरम्भ समारम्भ, प्रारम्भ, मन वच तन कीने प्रारम्भ / कृतकारित मोदन करके, क्रोधादि चतुष्टय घरकै॥ शत प्राउ जुइन मेदनते, अघ काने परछेदनते / तिनकी कई. कोलों कहानी, तुम जानत केवल ज्ञानी॥ विपरीत एकान्त विनय के, संशय अज्ञान कुनय के। वश होय घोर अघ कीने, बचते नहीं जात कहीने।। कुगुरुन की सेवा की नी, केवल अदया कर भीनी / या विधि मिथ्यात बढ़ायो, चहुँगति मधि दोष उपायो॥ हिंसा पुनि झूठ जो चोरी, परबनिता (यामानव) से हग जोरी। प्रारम्म परिग्रह भीने, पनपाप जु याविधि कीने // सपरस रसना घ्राणनको, दृगकान विषय सेवन को। बटुकर्म किये मनमाने, कुछ न्याय अन्याय न जाने / फल पंच उदम्बर खाये, मध मांस मधु चित चाहे। नहिं अष्टमूल गुण धारे, सेये कुविसन दुःखकारे // बाईस अभक्ष जिन गाये, सोभी निशदिन मुजाये। कछु मेदाभेद न पायो, ज्यों त्यों कर उदर भरायो॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com