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________________ (५१) विशेष वर्णन "जैनवीरों का इतिहास और हमारा पतन" (पृ०६९-९०२) नामक पुस्तक में देखिये । (२७) हस्तिकुंडी के राठौड़ वीर। हस्तिकुण्डो (राजपूताना) में सन् ६१६ ई० से 'विदग्धराज' राज्य करता था। यह राठौड़वीर जैनधर्मानुयायी था। इसका पुत्र 'मम्मट' भी जैनधर्मभुक्त था। मम्मट का पुत्र 'धवल' पराक्रमी जैनराजा था। वह हस्तिकुण्डी के राठौड़वंश का भूषण था । मेवाड़ पर जब मालवा के राजा मुज जे आक्रमण किया, तब यह उससे लड़ा था। सांभर के चौहान राजा दुर्लभराज से नाडौल के चौहानराजा महेन्द्र की इसने रक्षा की थी। धरणीवराह को इसने अाश्रय दिया था। सारांशतः धवल जैसे जैनवीर में यह परोपकार और साहसी वृत्ति होना स्वाभाविक था। जैनधर्म की भी इसने उन्नति की थी। (२८) जैनवीर कक्कुक। मंडोर (राजपूताने) में 'प्रतिहारांश' के राजा राज्य करते थे। उनमें अन्तिम राजा 'ककुक' बड़ा पराक्रमी था। यह जैनधर्मानुयायी था। इसके दो शिलालेख वि० सं०६१८ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034885
Book TitleJain Viro ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherKamtaprasad Jain
Publication Year1930
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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