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________________ ( ७३ ) इसमें जैनधर्म को एक वृक्षके द्वारा सूचित किया है, व्यासपीठ ( चौकी) जिनवाणी का प्रतीक है, चैत्य एक जिनमूर्ति द्वारा और जिनमंदिर एकदेवमंडप द्वारा दर्शाये गये हैं । सबकी दीवारों पर सुन्दर चित्र बने हुये हैं । पास में ही जैन पाठशाला बालकबालिकाओं के लिये अलग-अलग हैं । इस तीर्थ की मान्यता मैसूर के वर्तमान शासनाधिकारी राजवंश में पुरातनकाल से है । मस्तकाभिषेक के समय सबसे पहले श्रीमान् महाराजा सा० मैसूर ही कलशाभिषेक करते हैं । जैनधर्म का गौरव श्रवणवेल्गोल के प्रत्येक कीर्ति से प्रकट होता है । प्रत्येक जैनी को यहाँ के दर्शन करना चाहिये । यहाँ से लारीवालों से किराया तै कर इस ओर के अन्य तीर्थों की यात्रा करनी चाहिये । मार्ग में मैसूर, सेरंगापट्टम, वेणर, आदि स्थानों को दिखलाते हुये ले जाते हैं 1 मैसूर मैसूर पुराना शहर है और यहाँ कई दर्शनीय स्थान हैं । यहाँ चंदन की अगरबत्ती - तैल आदि चीजें अच्छी बनती हैं। यहाँ से १० मील दूर वृन्दाबन गार्डिन अवश्य देखना चाहिये । यहाँ जैन बोर्डिंगहौस के धर्मशाला में ठहरना चाहिये- वहीं एक जिन मंदिर है । दूसरा जिनमंदिर म्यूनिसिपल - ऑफिस के पास , । यहीं से 'गोम्मट गिरि' के दर्शन करना चाहिये । यहाँ से चलने पर मार्ग में सेरंगापट्टम् में हिन्दू-मंदिर और टीपू सुल्तान का Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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