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________________ ( ५७ ) एवं उनकी रानी ने इस पर्वत पर कई जिन मन्दिर-जिनमूर्तियां गुफा और स्तम्भ निर्माण कराये थे और कई धर्मोत्सव किये थे। यहां की सब मूर्तियां दिगम्बर हैं । सम्राट् खारवेल के समय से पहले ही यहां निर्ग्रन्थ श्रमण संघ विद्यमान था । निर्ग्रन्थ (दिग०) मुनिगण इन गुफाओं में रहते और तपस्या करते थे। स्वयं सम्राट् खारवेल ने इस पर्वत पर रह कर धार्मिक यम-नियमों का पालन किया था। उनके समय में अंग-ज्ञान विक्षिप्त हो चला था। उसके उद्धार के लिये उन्होंने मथरा. गिरिनगर और उज्जैनी आदि जैनी केन्द्रों के निर्ग्रन्थाचार्यों को संघ सहित निमन्त्रित किया था । निर्ग्रन्थ श्रणम संघ यहाँ एकत्र हुआ और उपलब्ध द्वादशाङ्गवाणी के उद्धार का प्रशंसनीय उद्योग किया था । इन कारणों की अपेक्षा कुमारी पर्वत एक महा पवित्र तीर्थ है और पुकार-पुकार कर यही बताता है कि जैनियों ! जिनवाणी की रक्षा और उद्धार के लिये सदा प्रयत्नशील रहो। खएडगिरि पर्वत १३३ फीट ऊंचा घने पेड़ों से लदा हुआ है । खड़ी सीढ़ियों से ऊपर जाया जाता है । सीड़ियों के सामने ही 'खंडगिरिगुफा' है, जिसके नीचे ऊपर ५ गफायें और बनी हैं 'अनन्तगुफा' में १॥ हाथ की कायोत्सर्ग जिन प्रतिमा विराजमान है । पर्वत की शिखिर पर एक छोटा और एक बड़ा दिगन्वर जैन मन्दिर है । छोटा मन्दिर हाल का बना हुआ है। परन्तु उसमें एक प्राचीन प्रतिमा प्रातिहार्य युक्त विराजमान है । बड़ा मन्दिर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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