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________________ ( ११० ) अजमेर चौहान राजाओं की राजधानी अजमेर आज भी I का प्रमुख नगर है । कहते हैं कि उसे ने बसाया था । इन चौहान राजाओं सोमेश्वर दि० जैन धर्म के पोषक थे । निस्सन्देह अजमेर जैनधर्म का प्राचीन केन्द्र स्थान है । मूलसंघ के भट्टारकों की गद्दी यहां रही है और पहाड़ पर पुरातन जैन कीर्तियां थीं। शहर में १३ शिखरवन्द मंदिर और २ चैत्यालय हैं। मंदिरों में सेठ नेमिचन्दजी टीकमचन्दजी की नसियां कलामय दर्शनीय है। दूर-दूर के अजैनयात्री भी उसे देखने आते हैं । यह मन्दिर तीन मज़िलका बना हुआ है । पहली मंजिल में अयोध्या और समवशरणकी रचना रंग विरंगी मनोहर बनी हुई है । दूसरी मंजिल में स्फटिक, माणिक आदि की प्रतिमायें विराजमान हैं। दीवालों पर तीर्थक्षेत्र के नक़शे व चित्र बने हुये हैं। तीसरी मंजिल में काठ के हाथी घोड़े आदि उत्सवका सामान है । मन्दिर के सामने एक उत्तंग मानस्तंभ बन रहा है । अन्य मन्दिर भी दर्शनीय हैं । शहर में दरगाह आदि देखने योग्य चीजें हैं। यहांसे राजपूताना और मध्यभारत की तीर्थयात्रा के लिये उदयपुर जावे । । 'राजपूताना चौहान राजा अजयपाल में पृथ्वीराज द्वि० और उदयपुर. उदयपुर में आठ दिग० जैन मन्दिर हैं - दो चैत्यालय भी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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