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________________ ( १०१ ) हुये थे । गजकुमार मुनिपर सोमिलविप्र ने यहीं उपसर्ग किया था, जिसे समभाव से सहन कर वह मुक्त हुये थे । गणधर महाराज श्री वरदत्त जी भी यहीं से अगणित मुनिजनों सहित मोक्ष सिधारे थे । ग़र्ज यह है कि गिरिनार पर्वतराज महापवित्र और परमपूज्य निर्वाण क्षेत्र है । उसकी वन्दना करते हुये स्वयमेव ही माल्हाद प्राप्त होता है - भक्ति से हृदय गद्गद हो जाता है । और कवि की यह उक्ति याद आती है: " मा मा गर्व ममर्त्यपर्वत परां प्रीतं भजन्तस्त्वया । भ्रम्यन्ते रविचन्द्रमः प्रभृतयः के के न मुग्धाशयाः ॥ एको रैवतभूधरो विजयतां यद्दर्शनात् प्राणिनो । यांति भ्रांति विवर्जिताः किल महानंद सुखश्रीजुषः ॥ " भावार्थ - "हे पर्वत ! गर्व मत करो; सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र तुम्हारे प्रेम में ऐसे मुग्ध हुये हैं कि रास्ता चलना भूल गये हैं, ( वह प्रतिदिन तुम्हारीही परिक्रमा देते हैं), किन्तु वही क्या ? ऐसा कौन है जो तुम पर मुग्ध न हो ! जय हो, एक मात्र पर्वत रैवतकी ! जिसके दर्शन करने से लोग भ्रान्तिको खोकर श्रानन्द का भोग करते और परम सुखको पाते हैं !" गिरिनार के दूसरे नाम ऊर्जयन्त और रैवत पर्वत भी हैं । वह समुद्रतलसे ३६६६ फीट ऊंचा प्रकृतिसौन्दर्यका पूर्वस्थल है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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