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________________ [ १२ ] वृक्षादि से व्यवहित पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं होता । यदि योग्यता को स्वीकार न करें तो चक्षु के प्राप्यकारी माननेवालों को, चक्षु से गन्ध का ज्ञान क्यों नहीं होता ? एवं चन्द्र के भीतर उसके रूप की तरह उसकी क्रिया का भी चक्षुरिन्द्रियद्वारा प्रत्यक्ष क्यों नहीं होता ? | यदि उसके प्रत्यक्ष न होने का कारण दूरता कहियेगा, तो फिर उसके लाञ्छन [ कलङ्क ] का भी प्रत्यक्ष न होना चाहिये | इसलिये योग्यता छोड़कर दूसरा कोई कारण नहीं माना जा सकता । यह सांव्यहारिक प्रत्यक्ष, जो बाह्येन्द्रियों की सहायता लेता है, अपारमार्थिक प्रत्यक्ष, अथवा पारमार्थिक परोक्ष माना जाता है । उमास्वाति वाचक ने 'तत्त्वार्थाधिगम सूत्र ' में सीरीति से विस्तारपूर्वक वर्णन किया है । सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष से भिन्न, याने इन्द्रिय वगैरह की सहायता के विना, केवल आत्माद्वारा उत्पन्न होनेवाला ज्ञान, पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहलाता है । उसके दो भेद एक विकल और दूसरा सकल । विकल के भी अवधि और मन:पर्यय के नाम से दो भेद हैं । + * पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, अन्धकार और छाया आदि व्यवहित रूपी द्रव्यों को भी प्रत्यक्ष करनेवाला ज्ञान, अवधिज्ञान कहलाता है । + मनुष्यक्षेत्र में रहनेवाले सभी मनवाले जीवों के मन www.umaragyanbhandar.com Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
SR No.034881
Book TitleJain Tattva Digdarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaydharmsuri
PublisherYashovijay Jain Granthmala
Publication Year
Total Pages52
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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