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________________ (५६) जैन जाति महोदय. प्र-तीसरा. संघ दिलगीर हो कहा कि भगवान् हम आपके गुरुमहाराज स्वयंप्रभसूरि के प्रतिबोधित भावक है और उपकेश पुर के श्रावक आपके प्रतिबोधित है वास्ते इन पर आपका राग है खेर आपकी मरजी इसपर आचार्यश्रीने कहा" गुरुणा कथितं मुहूर्त बेलायां गच्छामि " श्रावको तुम अपना कार्य करो में मुहूर्तपर आ जाउगा, श्रावक जयध्वनि के साथ वन्दना कर विसर्जन हुवे इधर उपकेशपुर में प्रतिष्टा महोत्सव बडे ही धामधूम से हो गया पूजा प्रभावना स्वामिवात्सल्यादि से धर्म की बडा भारी उन्नति हुइ । आचार्यश्रीने “निजरूपेण उपकशे प्रतिष्ठा कृता वेक्रयरूपेण कोरंट के प्रतिष्ठाकृता श्राद्धैः द्रव्यव्यय कृतः " यहतो पहला से ही पढ़ चुके है कि आचार्य रत्नप्रभसूरि अनेक विद्याओं के पारगामी थे आप निज रूपसे तो उपकेशपुर मे और वैक्रय रुप से कोरंटपुर में प्रतिष्टा एक ही मुहूर्त में करवादी उन दोनो प्रतिष्टा महोत्सव में श्रावकोने वहुत द्रव्य खरच किया था तत्पश्चात् कोरंट संघ को यह खबर हुई कि आचार्य रत्नप्रभसूरि निज रूपसे उपकेशपूर प्रतिष्टा कराइ और यह तो वैक्रयरूपसे आये थे इसपर संघ नाराज हो कनकप्रभ मुनि को उस की इच्छा के न होने पर भी आचार्य पद से भूषीत कर आचार्य बना दीया इसका फल यह हुवा कि उधर श्रीमाल पोरवाड लोगों का आचार्य कनकप्रभसूरि और इधर उपकेश वंश के श्रावको के आचार्य रत्नप्रभसूरि हो गये इन दोनो नगरो के नामसे दो साखा हो गह उन साखाओ के नाम से ही उपकेश गच्छऔर कोरंटगच्छ कि स्थापना हुईथी वह आज पर्यन्त मोजुद है इन दोनों मन्दिरोका प्रतिष्टा का समय में निम्न लिखित श्लोक पट्टापलि मे है. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034863
Book TitleJain Jatiyo ka Prachin Sachitra Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherRatna Prabhakar Gyan Pushpamala
Publication Year
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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