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________________ ६१ है. १ राजप्रश्रीयमें प्रदेशी राजा नास्तिक मतीका प्रतिबोधक केशी गणधरका और देव विमानादिकका कथन है. २ जोवानीगम में जीव अजीवका विस्तारसें चमत्कारी कथन करा है. ३ पत्रवणामें ३६ बत्तीस पदमे बत्तीस वस्तुका बहुत विस्तारसें कथन है. 8 जंबुद्विप पन्नतिमें जंबुद्दी - पादिका कथन है. ५ चंप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति में ज्योतिष चक्र के स्वरूपका कथन है. ६, ७ निरावलिका में कितनेक नरक स्वर्ग जाने वाले जीव और राजयोंकी माई आदिकका कथन है. GI ए । १० । ११॥ १२ आवश्यक में चमत्कारी प्रति सूक्ष्म पदार्थ नय निक्षेप ज्ञान इतिहासादिका कयन है, १ दशवैकालिक में साधुके आचारका कथन है २ पिंमनियुक्ति में साधुके शुद्धाहारादिकके स्वरूपका कथन है ३ उत्तराध्ययनमें तो बत्तीस अध्ययनो में विचित्र प्रकारका कथन करादै ४ बहों बेद ग्रंथो में पद विभाग समाचारी प्रायश्चित आ दिका कथन है ६ नंदीमे ५ पांच ज्ञानका कथन करा है. १ अनुयोगद्वारमें सामायिक के उपर चार Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com -
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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