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________________ ४ए धर्म और श्रावकके धर्मका यह स्वरूपहै इत्यादि धर्म देशना श्री महावीर नगवंते सर्वजातिके मनुष्यादिकोंको कथन करीथी. प्र. ६६-साधुके धर्मका थोमेसेमें स्वरूप कह दिखलानः न.-पांच महाव्रत और रात्रि नोजनका त्याग यह वस्तु धारण करे. दश प्रकारका यति धर्म और सत्तरेनेदे संयम पालन करे; ४२ बैतालीस दोष रहित निदा ग्रहण करे; दश विध चक्रवाल समाचारी पाले. प्र.६७-श्रावक धर्मका श्रोझेसे में स्वरूप कह दिखलान. उ.-त्रस जीवकी हिंसाका त्याग १ बमे जुम्का त्याग, अर्थात् जिसके बोलनेसे राजसे दंम होवे, और जगतमें जुठ बोलने वाला प्रसिध्द होवे. ऐसे चौरीमेंनी जानना २ बडी चोरीका त्याग ३ परस्त्रीका त्याग ४ परिग्रहका प्रमाण ५ ब्हें दिशामें जानेका प्रमाण करे. नोग परिनोगका प्रमाण करे; बावीस अन्नदय न खाने योग्य Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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