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________________ त्यादि सुंदर अंतःकरणकी वृत्ति प्रवावे तो साता वेदनीय कर्म बांधे, इति साता वेदनीयके बंध हेतु कहे १ इनसे विपर्यय प्रवर्ने तो असाता वेदनीय बांधे १ इति वेदनीय कर्म स्वरूप ३. अथ चोथा मोहनीय कर्म तिसके प्रभावीस नेद है, अनंतानुबंधो क्रोध १ मान २ माया ३ लोन ४ अप्रत्याख्यान क्रोध ५ मान ६ माया ७ खोन प्रत्पाख्यानावरण क्रोध एमान १० माया ११ लोन १२ संज्वलका क्रोध १३ मान १४ माया १५ लोन १६ हास्य १७ रति १० अरति १ए शोक २० नय १ मुगुप्सा स्त्रीवेद २३ पुरुषवेद २४ नपुंसकवेद २५ सम्यक्त मोहनीय २६ मिश्र मोहनीय १७ मिथ्यात्व मोहनीय श्. अथ इनका स्वरूप लिखतेहै; प्रथम अनंतानुबंधी क्रोध मान माया लोन जां तक जीवे तां तक रहे; हटे नही तिनमेसें अनंतानुबंधी क्रोध तो ऐसाकि जाव जीव सुधो क्रोध न बगेमे, अपराधी कितनो प्रा. धीनगी करे तोन्नी क्रोध न गेमे, यह क्रोध ऐ. साहै जेसे पर्वतका फटना फेर कदापि न मिले Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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