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________________ ११४ कहते है ? न. एकसौ १४८ वा ९५८ यह मध्य प्रकृतियांके भेद है, और उत्कृष्ट तो अनंत नेद है, क्योंके श्रात्मा के अनंत गुण है, तिनकै ढांकनेवालीयां कर्म प्रकृतियांनी अनंत है. प्र. १३३ - मनुष्य में जो शक्तियां अद्भुत काम करनेवालीयां है तिनका थोमासा नाम लेके बतलान, और तिनका किंचित् स्वरूपनी कहौ, और यह सर्व लब्धियां किस जीवकों किस का - लमें होतीयांदे ? न. - आमोसहि लो १ जिस मुनिके दायादिके स्पर्श लगनेसें रोगीका रोग जाए, तिसका नाम श्रमर्षोषधि लब्धि है, मुनि तिस ल विधवाला कहा जाता है, यह लब्धि साधुदीकों होती है. विप्पोसहि लदी २ -- जिस साधुके मलमूके लगने से रोगीका रोग जाए, तिसका नाम विट्पोषधि लब्धि है, इस लब्धिवाले मुनिका मल, विष्टा और मूत्र सर्वं कर्पूरादिवत् सुगंधि Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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