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________________ ९९ भी नही पावेंगे. प्र. १०१ - क्या सर्व जीव एक सरीखे नही है, जिससे सर्व जीव निर्वाश पढ़ नही पावेगें. • न - जीव दो तरे के है; एक नव्य जीव है १, दुसरे नव्य जीवहै; तिनमें जो भव्य जीव दोवेतो को निर्वाण पदकों प्राप्त नही होवेगं, क्योंकि तिनमे अनादि स्वभावसेंही निर्वाण पद प्राप्त होनेकी योग्यताही नही है; और जो नव्य जीव है तिनमें निर्वाणपद पावनेको योग्यता तो है, परंतु जिस जिसकों निर्वाण होनेके निमित्त मिलेंगे वे निर्वाणपद पावेंगे, अन्य नही. प्र. १०२ - सदा जीवांके मोह जानेसें किसी कालमें सर्व जीव मोक्षपद पावेंगे, तबतो संसारमें प्रव्य जीवही रह जायेंगे, और मोक्ष मार्ग बंद हो जावेगा ? न - जन्य जीवांकी राशि सर्व प्रकाशके प्रदेशोंकी तरे अनंत तथा अनागत कालके समयकी तरें अनंत है. कितनाही काल व्यतीत होवे तोजी अनागत कालका अंत नही आता है, इसो Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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