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[५] ज्ञान स्वरोदय। सोमवार शुक्र हि भलो, बुध वृहस्पति देख । चन्द्र योग में सुफल हैं, कहैं कबीर विवेक ॥ ८ ॥ तिथि अरु वार विचार करि, दहिने बाँये अंग । रन जीते साजन मिले, थिर कारज परसंग ॥९॥ कृष्ण पक्ष के आदि हि, तीन दिना लौं भान । फिर चंदा फिर भान है, फिर चंदा फिर भान ॥१०॥ शुक्ल पक्ष के आदि हि, तीन दिना लौं चंद । फिर सूरज फिर चंद है, फिर सूरज फिर चंद ॥११॥ सूरज की तिथि में चले, जो सूरज परकास । सुख देही को करत है, लेही लाभ हुलास ॥१२॥ शुक्ल पक्ष चंदा चले, परिवा लेहु विचार । फल आनंद मंगल करे, देही को सुख सार ॥१३॥ कृष्ण पक्ष तिथि में चलै, जो परिवा को चंद । होय क्लेश पीड़ा कछु, हानि ताप के द्वंद ॥१४॥ शुक्ल पक्ष तिथि में चलै, जो परिवा को भान । होय क्लेश पीडा कछु, की दुख कि कछु हान ॥१५॥
प्रश्न विचार । ऊपर बाँयें सामने, सुर बाँयें के संग । जो पूछ ससि योग में, तो नीको परसंग ॥१६॥ नीचे पीछे दाहिने, स्वर सूरज को राज । जो कोइ पूछ आयके, तो समुझो शुभ काज ॥१७॥
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