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________________ । ४४ ] हजार जगह उसने उतनी ही अशरफियें भेट रखार संपूर्ण भगवती सूत्र सुना । अठारां हजार उसकी माताने । नौहजार उसकी स्त्रीने इस प्रकार एक कुटुंबके ३ श्रद्धालुओंने ६३००० मोहरें चढाई थी। उस ज्ञान द्रव्यमें १ लाख ४५००० सोने मोहरे और भी मिला कर वह सब रकम उन्होने सोनहरी अक्षरोंसे कल्यमूत्र-और कालिकाचार्य कथा की प्रतियोंके लिखानेमें लगाई थी। यह महान्-प्रशस्य कार्य उन्होने विक्रम संवत् १४७१ में किया था। और प्रतियों वांचने पढने योग्य बडे बडे ज्ञान भंडारोमे रख दीयो । तपगतछाचार्य श्री सोम सुंदर मूरिजोका जन्म-वि. सं. १४३० माघ वदि १४ के दिन पालगपुर (गु. जरात ) में सज्जन शेठकी माल्हण दे नामक स्त्रीहुआ था. मूरिजीने सिर्फ ७ ही वर्ष की उमरमें श्री 'जयानंदसरिजी के पास दीक्षालो थी । १४५० में वाचक पद-और १४५७ में इनके आचार्य दमिला था। - [इस आचार्य भगवान् के परिवार के परि. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Unnaway. Surratagyanbhandar.com
SR No.034829
Book TitleGirnar Galp
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherHansvijayji Free Jain Library
Publication Year1921
Total Pages140
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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