SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 53
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (४८) लगा। वहां लक्ष्मी उपार्जन करके उसमेंसे यहुत द्रव्य धर्मार्थ सात क्षेत्रोंमें खर्चने लगा । और अष्टमी चतुर्दशीको पोषध भी करने लगा। एक दिन शून्य घरमें पौषध ले कर काउसग्गध्यानमें रहे । वहां व्यंतरदेवने कोप करके, सर्पका रूप धारण कर सेठको काटा । सारा दिन सेठ प्रतिमामें स्थित रहे । वहां तक व्यंतरदेवने अनेक प्रकारके उपसर्ग किये; किन्तु सेठ क्षुभित नहीं हुए । सेठकी इस प्रकारकी स्थिरता देखकर व्यंतर सन्तुष्ट होकर कहने लगा कि- तुम जो मांगो सो मैं ढूँ; ' परन्तु सेठने कुछ भी याचना नहीं की । तो भी व्यंतरने कहा कि-' आप पुनः मथुरा नगरीमें जाओ, और तुम्हारे भंडारमें रक्खे हुए बाईस कोडी सुवर्ण जो कोयलेके सदृश हो गये है, वे तुम्हारे पुण्यके योगसे सुवर्ण हो जायेंगे ।' फिर सैठने मथुरा नगरीमें आ कर निधान खोल कर देखा तो कोयलेके स्थान पर पुर्वके अनुसार सुवर्ण दृष्टिगोचर हुआ । वैसेही जलमार्गके प्रवहण भी पानीकी कमीके कारण कहीं खराबे नजीक रूक रहे थे, वे भी कुशलतापूर्वक आ पहूँचे । इस प्रकार सर्व स्थलसे पुनः छासठ कोडी द्रव्य एकत्रित हुआ । उसमेंसे दान देने लगा और भोग भोगने लगा। उसने कई जिनप्रासोद कराये । इस प्रकार सातों क्षेत्रों में अच्छी तरह धनका सव्यय करके धर्म सम्बन्धी अचल कीर्ति उपार्जन की । अन्तमें पुत्रको घरका भार सोंप कर अनशन किया। और अन्तमें काल करके पहले देवलोकके अरुणाभ विमानमें Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034825
Book TitleGautam Pruccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain Library
PublisherLakshmichandra Jain Library
Publication Year1921
Total Pages160
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy