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________________ किञ्चिद्वक्तव्य। जैनसाहित्यमें सैंकडों नहीं, हजारों जैनग्रंथ ऐसे हैं, जिनके अनुवाद हिन्दीभाषामें होनेकी बहुत ही आवश्यकता है । ऐसे ग्रन्थोंमेंसे “गौतम पृच्छा" भी एक है। परमात्मा महावीर देवके प्रधान शिष्य श्रीगौतमस्वामीने महावीर देवको पूछे हुए प्रश्न और भगवान्ने दिये हुए उनके उत्तर-यही इस ग्रंथका विषय है । संसारमें जीवों की स्थितियाँ भिन्न भिन्न प्रकार की देखने में आती हैं। कोई राजा है तो कोई रंक है। कोई सुखी है तो कोई दुःखी है । कोई काना है तो कोई कूबडा है । कोई लला है तो कोई लंगड़ा है। कोई बधिर है तो कोई मूक है । इसप्रकार सभी जीव सुख-दुःखका अनुभव कर रहे हैं । वह सुख-दुःख किन किन कर्मोके उदयसे प्राप्त होता है , अर्थात् कैसे कर्मके करनेसे जीव कैसे फलको पाता है , यह जानने के लिये यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है। विषयकी पुष्टि के लिये इसके कर्ता आचार्यने प्रत्येक प्रश्नोत्तर के ऊपर एक एक दृष्टान्त भी दिया है , जिससे पढ़नेवालों को अधिक आनंद मिलने के साथ विषय हृदयङ्गम भी हो जाता है । इस ग्रंथमें प्रारंभकी ग्यारह गाथाओं में प्रभोंके नाम मात्र दिखलाए गए हैं । तदनन्तर पनरहवीं गाथासे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034825
Book TitleGautam Pruccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain Library
PublisherLakshmichandra Jain Library
Publication Year1921
Total Pages160
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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