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(१६) तब निमित्तियाने उत्तर दिया कि 'जिसके देखनेसे ये दाढाएं क्षीर रूप हो जायेंगी और उस खीरका भोजन सिंहासन पर बैठ कर जो करेगा, उसके हाथसे तेरी मृत्यु होगी।
उक्त बातको श्रवण कर परशुरामने एक दानशाला स्थापित की और उप्तके आगे एक सिंहासन बनवा कर उन दाढाओंका थाल सिंहासन के उपर रखवाया ।
किसी समय वैताढय पर्वत पर मेघनाद नामक एक विद्याधरने अपनी पुत्रीका पति कौन होगा ? इस विषय का प्रश्न निमित्तियासे पूछा । निमित्तियाने सुभूमका नाम व पता बताकर उसके सम्बन्ध में कथनीय सब कथा कह सुनाइ । तब वह विद्याधर अपनी पुत्रीको लेकर सुभूमके आश्रम में आया और अपनी पुत्रीकी सुभूमके साथ शादी कर दी। और वह विद्याधर भी सुमूमका सेवक बन कर उसीके साथ रहने लगा।
एक दफे सुभूमने अपनी मातासे पूछा:-' हे माता! पृथ्वी क्या इतनी ही है ?' तब माताने कहा कीपृथ्वी तो बहुत बडी है। उसमें एक माखी की पांख जितने स्थानमें यह आश्रम है। जिसमें परशुरामके भयसे निवास कर रहे हैं । अपनी खास वासभूमी तो हस्तिनापुर है । ' इत्यादि सर्व वृत्तान्त कह सुनाया। जिसको श्रवण कर सुभूम क्रोधसे धमधमायमान हो उठा । वह गुफामेंसे बाहर निकल कर मेघनाद विद्याधर सहित हस्तिनापुरमें जहां दानशाला है, वहां गया। उसकी
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