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________________ के दिन वह नया मंदिरमें उत्सबके साथ भगवानको स्थापन कीया. १३२ वहांपरभी वह अन्तरिक्ष अरिहंतने जमीनको स्पर्श नहीं कीया, लेकिन बडी मुशकेलीसें, स्तुति-प्रार्थना करकें जमीनसें एक अंगुल उंचे स्थापन कीया. १३३ - उस वख्त वह मंदिरमें पूर्व सन्मुख आसनपर प्रभुकुं स्थापन करकें और (निर्मल) सम्यक्त्वकुं उपार्जन करके और वहीन मंदिरमें मेरा गुरु श्री विजयदेवसूरि जाकें चरण पादुका कों गुरु सेवा परायण श्रावकोद्वारा भक्तिसें स्थापन करा क में कृत कृत्य हुवा. १३४-१३५ उस्के पीछेभी कितनेक दिन वहां रहकर, देवाधिदेव पाचनाथको श्रेष्टभावसे वारंवार, भेटके, १३६ इधर पीछे पीछा आनेमें उत्सुक बनकर, में वहांस निकलकरके रास्ता में इधर उधर सब जगे लोकोंका उपकारके लीये अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ ( का महात्म्य ) की सूचना किनी. १३७ ।। - इस प्रकार दुसरा कोइभी आदमी अन्तरिक्ष पार्श्वनाथजीका आश्रय करेगा उसकाभी मनोरथ वह प्रभु पूर्ण करेगा. १३८ ग्रंथकारकी प्रशस्तिः । जगद्गुरु श्री विजयहीरसूरीश्वरजीने अकबरबादसाहसें सात तीर्थके ताम्रपत्र लिखाफर यावत्चंद्रदिवाकर जय कीया. १३९ . उनके शिष्य श्री विजयसेनमूरिजीने जहांगीर बादशाहकों प्रतिबोध देकर प्रतिपदा. रविवार और गुरुवार जीवदया पलाइ. १४० . . . Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034788
Book TitleChamatkari Savchuri Stotra Sangraha tatha Vankchuliya Sutra Saransh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKshantivijay
PublisherHirachand Kakalbhai Shah
Publication Year1923
Total Pages100
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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