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अन्यदा पापकर्मोदय आनेसें राजाका शरीरमें भयंकर कोढ रोग हुवा उससे वहराजा वारंवार मूर्छा पाताथा, ३३ ।। __अनेक प्रकारकें ऊषधको जाननेवाले वैद्योंने बहुत से उपचार कीया लेकिन उपवन बगीचें और जलाशयोमेंसे कीसी स्थानमें राजा लेशमात्र शान्ति पाया नही. ३४
वह वेदनासें व्याकुल हुवा एलचराना रोगकी शान्तिकें लीये एकदिन अपना नगरसे बाहिर निकला. ३५
वहां पानीकी तृषासें व्याप्तहुवा राजा, इधर उधर घुमता, जहां चिंचा (आमली)का दरखतकें नीचें पार्श्वनाथ प्रभु करकेसहित कूप है वहां आया. ३६
उसी वखत वह कूप (वावडी)में, हाथ पग और मुखको प्रक्षालन करके, निर्मल तथा स्वादिष्ट जलको पान करके पीछे राजा अपना पडावपर आया. ३७
धुप (गरमी)का वखत जानेपर, सायंकालमें शान्त चित्तवाला वह राजा अपना पडावमें अपनी राणीके साथ पल्यकमें मुत्ता. ३४
जो राजा हमेशां रातभर (विना पाणीका) मत्स्यकी माफक तरफडता था वह राजाकों उस रात्रिमें निश्चिंत तया इच्छानुसार निद्रा आइ. ३९
प्रातःकालमें जिसवखत राजा उठा उस वखत राजाका हाथ पग और मुखको निरोगी देखकर, राणीनें राजाको पुछा. ४०
हे स्वामिनाथ ! गये कलदिन आपने हाथ पग और मुख कहांपर धोयाया? कि जिससे आजे यह रोगरहित मेनेकुं दिखता है.४१
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