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पाँचवाँ अध्याय गौतम बुद्ध के सिद्धान्त और उपदेश , संक्षेप में गौतम बुद्ध के "धम्म" या धर्म का सारांश "आर्य सत्यचतुष्टय" अथवा "चार आर्य ( उत्तम) सत्य" है। चारों आर्य सत्य क्रम से ये हैं:-(१) संसार में "दुख" है; (२) दुःख का "समुदय” अर्थात् कारण है; (३) इस दुःख का “निरोध" हो सकता है; और (४) इस दुःख के निरोध का "मार्ग" अथवा उपाय है।
जब गौतम बुद्ध सम्यक् ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध गया से काशी को गये, तब वहाँ उन्होंने अपने पाँच पुराने शिष्यों को उपदेश दिया। उस उपदेश में ये चारों सत्य अच्छी तरह से दिखलाये गये हैं।
आर्य सत्य-चतुष्टय-भगवान बुद्ध ने कहा-“हे भिक्षुओ, जन्म दुःख है, जरा (बुढ़ापा ) दुःख है, व्याधि (रोग) दुःख है, मृत्यु दुःख है । जिन वस्तुओंसे हम घृणा करते हैं, उनका उपस्थित होना दुःख है । जिन वस्तुओं को हम चाहते हैं, उनका न मिलना दुःख है । सारांश यह कि जीवन की पाँचो कामनाओं में अर्थात् पाँचो तत्वों में लिप्त रहना दुःख है। हे भिक्षुओ, यह प्रथम आर्य सत्य है। ___"हे भिक्षुओ, लालसा पुनर्जन्म का कारण है। पुनर्जन्म में फिर लालसाएँ और कामनाएँ उत्पन्न होती हैं । लालसा तीन
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