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अशोक के विषय में आपका लेख पुष्ट और जोरदार है। खेद है कि डॉ. शाह के आधार से मैंने अपने एक निबंध में कइ एसे शब्द जैन पारिभाषिक शब्दरूप में दीये हैं जो अन्यत्र भी मिलते है । यदि संभव हुआ तो उन्हें अब मैं निकाल दउंगा। यदि जरा पहले आपका निबंध मिलता तो सुगमता से यह सुधार हो जाता । खेर अभी प्रयत्न करूंगा।
कामताप्रमाद जैन एम. आर. ए. एस. आ. एडीटर वीर.
आपकी भेजी हुई आलोचना पुस्तिका मीली । धन्यवाद ! डॉ. शाह के संप्रति या अशोकवाले लेखकी संक्षेप में इस में बड़ी सुंदरता के साथ आलोचना की है । यह छोटी होते हुए भी बडी सचोट और अध्ययनपूर्ण आलोचना की है । अवसर पाकर इस समालोचना को भी उत्तर स्वरूप में हिन्दी पत्रो में दउंगा। भारती भवन, उज्जैन,
सूर्यनारायण व्यास. ____“ अशोकना शिलालेखो उपर दृष्टिपात " नामकी पुस्तिका मील गई थी मैं दो तीन महीने से बिमार होने के कारण आपकी सेवा में पत्र नही लीख सका हूं । इस अविनय के लीए आप क्षमा करे । डा. त्रीभोवनदास के विचारों की आपने बडी मार्मिकता से और बहुश्रुतता से समालोचना की हैं । आपने इस पुस्तिका भेजने के लिये सेवक का नाम याद किया इस लिये आपका आभारी हूं। पाटण, सागरनो उपाश्रय,
विद्वद्वर्य पुण्यविजय
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