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________________ पत्रो. मैंने आपका “ अशोकना शिलालेखों उपर दृष्टिपात " आद्योपान्त पढ़ा । यह वस्तुतः आनन्द का विषय है कि एक जैन आचार्य मिथ्यारूपसे जैन धर्म का गौरव बढ़ाने का प्रयत्न करनेवालों की चेष्टाओं का निग्राहण करे । आपकी युक्तियां अकाट्य है । उन्हें पढ़नेपर श्रीयुत शाहका कथन निःसार प्रतीत होता है । आपके प्रश्न भी बहुत मार्के के हैं । यदि शाह महोदय निष्पक्षरूपसे उनका उत्तर ढूंढने का प्रयत्न करेंगे ( मेरे समजमें उत्तर देना तो असंभव है) तो उनकी सम्राट अशोक तथा प्रातःस्मरणीय महाराजाधिराज संप्रति के विषय में भ्रान्तिपूर्ण धारणाए सहज ही नष्ट हो जायगी। दशरथ शर्मा. एम. ए. बीकानेर. आपकी भेजी हुई सुंदर पुस्तिकाएं भी मीली । कोटिशः धन्यवाद । श्रीसूरीश्वरजी महाराज का पत्र वांचकर बड़ा आनंद मिला उनकी स्मृति ताजी हो आई । वह जब आलीगंज आये थे तब में स्कूलका छात्र था किन्तु उनके साथका बह दो दीन अब भी मेरे हृदयपट पर सजीव है धन्य थे वह । उनकी रचनायें भी उनके कार्योंकी तरह महत्त्वशाली है। आपके निबंध तो मैं पहले पढ़ चूका हूं, परंतु आपने जिस निष्पक्ष और गवेषणात्मक रीतीसे भगवान महावीर के - विहार और अशोकके धर्मलेखों पर विवेचना की है वह मूल्य मई है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034754
Book TitleAshokna Shilalekho Uper Drushtipat Namna Pustak Sambandhi Ketlak Prasiddha Paper ane Masikoma Pragat thayela ane Tadvishyagna Vidvanona Ketlak Abhiprayo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay Jain Granthmala
PublisherYashovijay Jain Granthmala
Publication Year1936
Total Pages18
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size3 MB
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