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________________ जो चित्र दिया है उसमें नम्रता को आच्छादित कर दिया है। यह अति साहस है और इसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता है । ऐसी उच्छृङ्खल रचनाओं का जोरदार खण्डन होना आवश्यक है । जैन संस्थाओं को चाहिये कि उक्त पुस्तक की ठीकर आलोचना सुयोग्य विद्वानों से कराके जैन पत्रों में प्रकाशित कर दें। जिससे जैन धर्म का अनिष्ट न हो । हमें यह जानकर हर्ष है कि श्री इतिहास तत्त्व महोदधि विजयइन्द्रसूरिजी इस पुस्तक पर एक आलोचनात्मक लेख प्रकट करने वाले हैं। दिग० जैन विद्वानों को भी उनका अनुकरण करना चाहिये । का० प्र० वीरसंदेश २५ ओगस्ट १९३६ आगरा. __कुछ समय हुआ भावनगर के 'जैन' पत्र की सिलवर जुबली विशेषांक में डा० त्रिभुवनदास शाह का एक लेख.अशोक के विषय में प्रगट हुआ था, जिस में उन्हों ने अशोक के धर्म लेखों को जैन सम्राट् सम्पति का बताया था । प्रस्तुत पुस्तक में उपरोक्त रिजी म० ने उनके लेख का खण्डन किया है और सिद्ध कर दिया है कि वे लेख सम्प्रति के नहीं हैं । आपकी शैली गूढ, निष्पक्ष और गवेषणात्मक है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034754
Book TitleAshokna Shilalekho Uper Drushtipat Namna Pustak Sambandhi Ketlak Prasiddha Paper ane Masikoma Pragat thayela ane Tadvishyagna Vidvanona Ketlak Abhiprayo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay Jain Granthmala
PublisherYashovijay Jain Granthmala
Publication Year1936
Total Pages18
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size3 MB
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