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________________ C455 IPI किं च मएसु दोसु वि मगहंगकलिंगमाइआ सव्वे। पाएणारिअदेसा एगम्मि अ जोयणे हुंति ॥ १६ ॥ भा०सह अर्थ-किंच कहेतां ग्रंथकर्ता बन्ने आचार्यना कयनमा दक्षण देछे, जो एह, मानवामां आवे के एक प्रमाणांगुले सहस्र उत्सेधांगुल एक सूचीप्रमाणंगुले चारसेउत्सेधांगुल ए प्रकारे पृथिव्यादिकनुं प्रमाणमानीयेतो. पाये मगधदेश, अंगदेश, कलिंगदेश, एवं आदि सर्व आर्यदेशनो एक जोजनमा समावेश थाय ॥ १६ ॥ | सहस्समाणे चउरंसजोयणे दीहपिहुलभावेणं । हुंति परुप्परगुणणे लक्खा दस जोअणाण फुडं ॥१७॥ अर्थ-चउरंसजोजन केवु छे, चउरंसजोजन लांबपणे तथा पहोलपणे थइ सहस्र जोजनमान छे जेहनुं एह, जोजन परस्परगुणीये तो दाये दाये सो एटले एकजोजनना दशलक्षयोजन थाय, आएक आचार्यनो मत ॥१७॥ हवे बीजो मत कहे छे. तेमनोआ हिसाब छे. ॐ चउसयमाणम्मि पुणो एगो लक्खोसहस्सतह सट्ठी। एवं एगम्मि वि जोअणम्मि कह तेन मायंति॥१८॥ अर्थ-एक प्रमाणांगुल योजनने विषे लांबपणे पहोलपणे चारसे गणुमान छे ते मान केटल थाय ? चारसोने चारसोगुणाकरीये तो एकलाख साठसहस्र (१६००००) थाय एवं ए प्रकारे एक योजनने विषे ते आर्यक्षेत्र केम न माय अर्थात् मायज. ॥१८॥ एयं च पुणमलोगिग जमेगजोयण महीइ ते माया। तह सेसजोयणाणं पावइ विहलत्तणं भरहे ॥१९॥ अर्थ-इदं पूर्वोक्तं पुनःबली अलोकिक जे एकजोजन पृथिवीमां ते सघलाए आर्यदेशो माया तथा वली भरतक्षेत्रने विषे शेष योजन 18/ विफलपणु पामे. ठालांज रहे. ॥१९॥ वली ग्रंथकर्ता बन्ने मतोमा दूषण देखाडे छे.. ६ तह बारवई नयरी अहवा उझाउरी य जा तासिं। धणयसुरनिम्मियत्तेण किल पमाणं समाणं ति॥२०॥ -सथा द्वारिकानगरी अथवा अयोध्यानगरी, ते नगरीने धनदसुर नीपजाववा पणे ते किल निचे प्रमाणे सरखीज थाय. ॥२०॥ C ॥३ ॥ 36KHUSUSHISHISHIA USHISHIGHISAS Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyahomandar.com
SR No.034744
Book TitleAngulsattari
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMunichandrasuri
PublisherMahavir Jain Sabha
Publication Year1918
Total Pages16
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size2 MB
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