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________________ जन्म भूमि और माता त्रिशला के स्वप्न ईस्वी सन् ५६६ वर्ष पूर्व यह भारतदेश छोटे छोटे राष्ट्रोंमें भिन्न २ नामसे विभाजित था। उस समय बिहार प्रान्तमें वैशाली नामकी नगरी थी। उसके अन्तर्गत क्षत्रीय कुंड नामका ग्राम था। जिला गयामें जहां पर आज लखवाड़ नामका ग्राम बसा हुआ है । वहीं क्षत्रीय कुंड ग्रामकी स्थिति बतलाई जाती है। वही भगवान महावीरकी पुण्य जन्मभूमि है । यद्यपि यह क्षत्रीय कुंड वैशालोके अन्तर्गत होते हुएभी वह एक स्वतंत्र राजधानी भी था। वहांके राजाका नाम सिद्धार्थ था । राजा सिद्धार्थके आधीन कोई बड़ा राज्य न था फिरभी उनके राज्यकी शिक्षा, वैभव, मान-सम्मान और कला-कुशलता अन्य पड़ोसी राज्योंसे बहुतही बढ़ी चढ़ी थी। राजा सिद्धार्थ की रानी का नाम त्रिशला था । कहीं कहीं रानी त्रिशलाको त्रिशला क्षत्राणो के नामसे भी सम्बोधित किया गया है । इससे भी मालुम होता है कि राजा सिद्धार्थ कोई छोटेसे राज्यके ही क्षत्रीसरदार थे। परन्तु उनका राज्य धन धान्य एवं सुख सम्पतिसे परिपूर्ण था; इसलिये वे अपने समयके गौरववान राजा गिने जाते थे। राजा सिद्धार्थनाय अर्थात् ज्ञाय या ज्ञात वंशी क्षत्रीय जातिके मुखिया सरदार थे जिनका गोत्र काश्यप था। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034732
Book TitleAntim Tirthankar Ahimsa Pravartak Sargnav Bhagwan Mahavir Sankshipta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGulabchand Vaidmutha
PublisherGulabchand Vaidmutha
Publication Year
Total Pages144
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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