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________________ शिष्य मुनिश्री ललितविजयजी भी कुछ वर्षोंसे गुजरातमें ही विचर रहे हैं । वे तुम्हें *दीक्षा देंगे, पढ़ावेंगे, और प्राणप्रिय अपने लघु-बन्धु के समान रक्खेंगें। वह तुम्हारे ही देशबन्धु हैं इसलिये तुम्हारा-उनका धर्मप्रेम प्रगाढ़ रहनेसे एक दूसरेको धर्म में सहायता मिलेगी। यह सुनकर वसन्तामलजी का मनो-मयूर नाचने लगा। उन्होंने कहा कृपालु गुरो ! आप जरूर मुझे श्री ललितविजयजी के पास भेज दीजीये। मुझे तीर्थयात्रा के साथ ही साथ उनके दर्शनोंका भी लाभ होगा। गुरु महाराजने प्रसन्न चित्तसे मुनिश्री ललितविजयजी * आप इस समय पन्यास पदवी को अलंकृत कर रहे हैं। वर्तमान समय के आचार्यश्री विजयवल्लभसूरिजी महाराज के सुयोग्य और विद्वान् शिष्यवर्ग में से आप एक हैं । आप पूर्ण विद्वान् सच्चे त्यागी और पहले दर्जेके गुरुभक्त है । आप जैसे योग्य विद्वान् गुरुभक्त एवं गुणग्राही हैं वैसेही विद्याप्रेमी हैं " श्री पार्श्वनाथ उम्मेद जैन बालाश्रम (उम्मेदपुरका विद्यालय) “ तथा श्री पार्श्वनाथ जैन विद्यालय वरकाणा" आपही के सतत परिश्रम का फल है। वहाँ आजकल करीबन् १५० विद्यार्थी धार्मिक एवं व्यावहारिक अध्ययन करके अपने आपको विद्वान् बना रहे हैं । आपके इस विद्याप्रेमको देखकर अभी १९९० में ( बामणबाडजी तीर्थ में पोरवाड सम्मेलन की ओरसे ) आपको सम्मानार्थ “प्रखर शिक्षा प्रचारक मरुधरोद्धारक" की पदवी प्रादन हुई है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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