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________________ (२) सन्मुख मस्तक नत करते हैं । क्या हर एक सच्चे मनुष्य को स्वयं अनुभव नहीं होता कि उसने खुद को उसके सामने जो कि उससे उच्च है भिक्षुक नहीं बना लिया ? मनुष्य के हृदय में इस से उच्च अथवा कल्याणकारी भावना निवास नहीं करती ॥ ___ महात्मनां कीर्तनं हि श्रेयो निःश्रेयसास्पदम् । महात्माओं का गुणानुवाद करना ही कल्याण और मोक्ष प्रद है। नरजन्म पाकर लोक में, कुछ काम करना चाहिए । अपना नहीं तो पूर्वजों का, नाम करना चाहिये । जीवन के ऐहिक और पारलौकिक अभ्युदय में अन्य वस्तुओंकी अपेक्षा, उत्तम पुरुषों की जीवनी अधिक उपयोगी है । साधारण पुरुषों को जीवन के वास्तविक लक्ष्य की ओर प्रयाण करने में उनसे विशेष सहायता मिलती है । उच्च आदर्श पर पहुंची हुई आत्माएं, अपने उद्धार के साथ दूसरों के उद्धारमें भी सहायभूत होती हैं । उनका जीवन दूसरों के लिए आदर्श रूप होता है । जीवन के प्रशस्त मार्ग में गमन करने वालों को वह ( उत्तम पुरुषों का जीवन ) पूरे मार्ग दर्शकका काम करता है। आज हम इसी उद्देश्य से कर्मयोगी, वीरात्मा जैन मुनि के बहुमूल्य आदर्श जीवन को संक्षिप्त रूप से सामने रखने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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