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लिखने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती क्योंकि आप प्रसिद्ध लेखक और वक्ता हैं । श्रीमान् पंडित महोदयने कष्ट उठाकर अपने ढंग का जीवन चरित्र तैयार कर के सं. १९८९ के कार्तिक मास में सादड़ी ( मारवाड़ ) में मेरे पास भेज दिया, पढ़ कर चित प्रसन्न हुआ।
चातुर्मास के बाद पंन्यासजी श्री ललितविजयजी महाराज के दर्शन हुए, तब मैंने श्रीपंन्यासजी महाराजसे विनम्र प्रार्थना की, "महाराज साहिब ! श्रीगुरुमहाराज का जीवनचरित्र तैयार होकर आया है, कृपया आप इस को देखलें और कुछ संशोधन तथा परिवर्तन करना उचित समझें, तो करदें, क्योंकि आपश्रीजी उनके (गुरुमहाराजके ) गुरुबंधु हैं और वे आप श्रीजी के सहवास में भी आचुके हैं।
श्री पंन्यासजी महाराजने मेरी इस नम्र प्रार्थना पर ध्यान देकर उचित स्थानों में न्यूनाधिक करके तथा साथ ही योग्य स्थानों में सुन्दर संस्कृत के श्लोक तथा हिन्दी भाषा के मनोहर पद्य देकर जीवनचरित्र को और भी सुन्दर बना दिया ।
पूज्यपाद परम गुरुदेव श्रीमद्विजयवल्लभसूरिजी महाराजने मुझ पर अनुग्रह करके इस को साद्योपान्त देखने की कृपा की, इस के लिए इन दोनों पूज्य महा पुरुषों Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com