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________________ हे सूरीश्वर ! हे शान्ति गुरुवर ! मैं आपके चरण कमलों में नमस्कार करती हूँ। शिखरिणी वृत्तम् सदा विश्वप्रेमी वितरति मुदा प्रेमसुपयः । जनानां तप्तानां शमयति गुरुस्तापदहनम् ।। सुपुर्य्या मांडोल्यां चरणयुगले भक्तिसहितम् । प्रभोः सम्राट शान्तेर्भवतु शतशः हीरकनतिः ॥६॥ अर्थ--हे गुरुदेव ! आप विश्वप्रेमी हैं। सदा आनन्दपूर्वक प्रेमामृत का वितरण करते हैं। त्रिविध ताप से जलते हुए लोगों के तापरूप अग्नि को आप शान्त कर देते हैं । हे सूरि सम्राट् ! शान्ति गुरुदेव ! सुपुरी मांडोली के मध्य, आपके पावन चरण कमलों में हीरा बहिन भक्ति पूर्वक शतशः नमस्कार करती है। गुरु स्तुतिः गुरुवमा मुरुर्विष्णुः गुरुदेवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१॥ अर्थ--गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं और गुरु ही महादेव हैं । साक्षात् परब्रह्म भी गुरुदेव ही हैं। ऐसे श्री गुरुदेव को नमस्कार हो। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034723
Book TitleAbuwale Yogiraj ki Jivan Saurabh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandanmal Nagori
PublisherChandanmal Nagori
Publication Year1964
Total Pages94
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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