SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 78
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ६० श्राविकाओंके उद्धारमे हमने प्रतिवर्ष एक क्रोड द्रम्म अवश्य खर्चना, इससे ज्यादातो व्यय करना परन्तु कमती नही"। मंत्रीश्वरको इस नियमका पालन करते देखकर सरिशेखरने "ज्ञांतिपालनवराह" का खिताब दिया था। ॥ तीर्थयात्राका समारोह ॥ एक समय श्रीनयचन्द्रसूरिजीका पत्र आया, मंत्रियोंने उसे गुरुप्रसाद समझकर आदरपूर्वक शिरोधार्य किया, वांचकर सकल कुटुंबको सहर्ष सुनाया। पत्र द्वारा सूरिजीमहाराजने यह आज्ञा की थी कि-"आप दोनो ही भाइयोने पहले श्रीसिद्धाचलजीका संघ निकाला उस चक्त आपकी इतनी हैसीयत नही थी, आज आपके पास सर्वप्रकारकी सामग्री है इसलिये यदि तीर्थाधिराजकी यात्राका लाभ लिया जाय तो बहुत हर्षका कारण है"। __ इस पत्रको वांचकर अखिल मंत्रिकुटुंबने जो हर्ष मनाया था उसको ज्ञानीविना कौन कह सकताथा । १ हर्षका समय है कि जैन जातिमें आजभी ऐसे ऐसे उदार गृहस्थ संसारका उपकार और उद्धार कर रहे हैं । मुंबई के प्रसिद्ध और प्रख्यात जैन व्यापारी-प्रेमचंद-रायचंद-को कुल दुनिया जानती है बल्कि अंग्रेज लोग तो प्रेमचंदको "व्यापारी शहेनशाह" के उपनामसे बुलाते थे, उस प्रेमचंद रामचंदने अपनी जिन्दगीमें ६० लाख रुपया परोपकारके कार्योंमें लगाकर श्रीजिनशासनकी वजा फरकाई थी। । देखो सनातन जैनपु. २-अंक ३-सं. १९०६। है भौर रामाविषप्रसादसितारे हिसके प्राय । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034722
Book TitleAbu Jain Mandiro ke Nirmata
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1922
Total Pages134
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy