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________________ पंडितोंके विषयमें अनेक तरहकी चर्चा हुई, कुछ देरतक और प्रासङ्गिक बातें होती रहीं, भीमदेव महाराजकी आज्ञासे सभा बरखास्त हुई । महाराज भीमदेव और उनके कुछ खास आदमी सभामें बैठेथे, बाहिरसें छडीदारने आकर प्रार्थना की-महाराज ! देशावरोंमें फिरताहुआ एक अपना दूत हजूरके दर्शनोंका उत्कंठित है। भीमदेवने कहा-आनेदो, दूत आया और नमस्कार कर सामने खडा रहा । भीमदेवने उसकी तर्फ देखकर गंभीरतासे पूछा-क्युं क्या खबर है ? कुछ कहना चाहते हो?। दूतने फिरसे नमन कर हाथ जोड अपने वक्तव्यको कहना शुरु किया, वह बोला-साहिब ! मैं आज एक अनिष्ट जैसा समाचार महाराजाधिराजके चरणोंमें निवेदन करने आया हूं, कहनेको जी नही चाहता तोभी विना कहे सरे ऐसा नहीं। सिन्धु और चेदीदेशके राजा आपश्रीकी आज्ञा माननेसे इनकारी हैं, इतनाही नहीं बल्कि महाराजा साहिबकी कीर्तिके भी विरोधी हैं। गुजरातके छत्रपति और राज्यरक्षक मंत्रीवरोंकी निन्दाके उन्होंने ग्रन्थ तय्यार कराए हैं। इन राजाओंकी जैसी इच्छा है वैसा इनके पास बल भी है, उसमेंभी सिन्धु नरेशने तो अन्य कई राजाओंको अपने वशवर्तीभी करलिया है इसलिये अपने लिये बंदरको दारू जैसी घटना बनरही है, आजकल सिन्धुराज बडाही अहंकारमें आरहा है, यह बात मेरे सुननेमें आई कि तुरन्तही आपको खबर देनेके लिये आया हूँ। बाबु. २ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034722
Book TitleAbu Jain Mandiro ke Nirmata
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1922
Total Pages134
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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