SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 34
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मीभी अच्छे समर्थथे, भीमदेवकी जैनधर्मपर बढती जाती आस्ताको देख इनके मनमें अनेक तरहके विचारजाल गूंथे जारहेथे । __भीमदेवके राज्याभिषेक समय नगरशेठ श्रीदत्तने राज्यतिलक करनेकी इजाजत मांगी, इजाजत मिली, राज्यतिलक नगरशेठके हाथसे हुआ, यहभी उन्हे सर्वथा अरुचिकर था । वह इसमें यह समझते थे कि वास्तविक रीतिसे सेनापति या मुख्यमंत्रीकोही राज्यतिलक करनेका अधिकार होता है । यह आशय उन्होंने एक दफा सेनापति संग्रामसिंह और मंत्री सामन्तसिंहके पास जाहिरभी किया था, संग्रामसिंह मूल मारवाडदेशके वतनीथे, उन्हें अपनी टेकपर रहना बडा पसंद था, हम राजाकी नोकरी करते हैं, राजाने हमकों राज्यरक्षणके लिये आजीविका देकर अपने विश्वासपात्र बनारखा है, हमें उनकी नौकरी बजानेके बदले एक दूसरेके बुरेमें क्यों उतरना चाहिये ? येह सोचकर उन्होंने दामोदर महतासें इतनाही कहा-मंत्रीराज! आप दाना हैं, आपकी समझके आगे मेरी बुद्धि तो तुच्छही है तो भी मेरी अर्ज इतनीही है कि राज्यके कामोंमें धार्मिक फिसादोंकों क्यों आगे करना चाहिये? . ॥ सिंधपर सवारी ॥ ऊपर "द्रोणाचार्य" वगैरह तीन आचार्योंके नाम लिखेजा चुकेहै, उनमेसे "सूराचार्य"जीको बुलाकर अपने पंडितोसे धर्मवाद करानेके लिये मालवपति धारा नरेशने अपने मंत्रिलोगोंको पाटण भेजा हुआथा, वह मालवमंत्री भीमदेवकी आज्ञा लेकर विदाय हुए. थोडीदेर घारा नरेशकी सभाके Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034722
Book TitleAbu Jain Mandiro ke Nirmata
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1922
Total Pages134
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy