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________________ १२ भाईके साथ विमलकुमारकों लेकर पाटण आई, भोजन शयन स्थान आदि सर्ववस्तुएँ तयार कराइ गइ, मंडप रचाया गया । शहरके और अन्यस्थलोंके स्वजनसंबंधीलोगोंको आमत्रण दिया गया। उधर नगरशेठके वहांभी सब तरहकी तयारियें होने लगी, राज्यकी मददसें उन्हें जिस जिस वस्तुकी जरूरत थी अनायास मिलगई । निर्धारित शुभदिनमें बडे आडंबरके साथ वर कन्याका पाणिग्रहण हुआ, नगरशेठने अपनी कन्याकों और जामाताकों अखुट संपत्ति दी, श्रीदेवीने श्वशुरपक्षके सर्व वृद्धोंको नमन किया । सासु वगैरहने हर्षभरे हृदयसे बहुकों अनेक आशीर्वाद दिये, विमलकुमारने इस प्रसंगपर महाराज भीमदेवकोंभी आमत्रण किया, राजा उनके भाग्य सौभाग्यसें उनकी कीहुइ सेवा शुश्रूषासें बडे प्रसन्न हुए, उन्होंने कुछ दिनोंके बाद उनको एक राज्याधिकारी बनाया, उस अधिकारसें विमलकुमारने बडी प्रशंसा और श्लाघा कमाई । राजाने उन्हे उनके पिताकी जगहपर अपना मंत्री बनालिया, कुमार ज्युं ज्युं ऊंचे अधिकारपर चढने लगा त्यु त्यु उसमे संसारभरके प्रशंसनीय सद्गुणोंका संचार होने लगा। विमलकुमारके छोटी उमरसें धार्मिक दृढ संस्कार थे, इसलिये इस बाह्य संपत्तिकों वोह धर्म कल्पवृक्षके फल समझकर देवा. धिदेव परमात्माकी पूजा, निर्ग्रन्थ साधुमहाराजाओंकी भक्तिसेवा, समानधर्मिलोगोंकी सारसंभालमें एकचिचसें लगा रहता था, धर्मार्थकाम और मोक्षकों वोह अबाधितपणे आराधन किना Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034722
Book TitleAbu Jain Mandiro ke Nirmata
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1922
Total Pages134
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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