SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 29
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ख्यालमें लाकर वीरमतीका मन संकुचित रहा करता था, परन्तु "भाग्यानि पूर्वतपसा किल संचितानि, काले फलन्ति पुरुषस्य यह वृक्षाः।" ॥ इच्छितसिद्धि ॥ विमलकुमारके मामा कुछ व्यापारभी करते थे, और कुछ खेतीभी करते थे, विमलकुमार मामाके खेतों तर्फ जा रहाथा, रास्तेमें आते जाते कहीं पोली जमीन देखकर उसने हाथकी लकडीकों वहां भोंक दिया, लकडी सीधी नीचे न जाकर वांकी होकर नीची चलीगई, विमलकुमारकों संशय पडा तो उसने ऊपरसें कुछ माटी हटा दी, कुछही नीचे खोदनेपर एक चरु धनसे पूर्ण मिल आया उसे लेकर कुमार घर आया उसने वोह चरु अपनी माताकों देकर उसकी प्राप्तिका वृत्तान्त कह सुनाया । वीरपत्नी वीरमती अतिशय प्रसन्न होकर बोली बेटा ! तूं भाग्यवान् है पुण्यवानोंके लिये सुनाजाता है कि 'पदे पदे निधानानि मुझे निश्चय होता है कि इस शुभप्रसङ्गपर जो तुझे निधान मिला है, सो इस निमित्तसें अवश्य जाना जाता है कि, श्रीदेवीभी पूर्ण सौभाग्यवती और पुण्यवती है, और इस उत्तम कन्याके घरमे आनेसें तुमारी कीर्तिमें बहुत कुछ वृद्धि होगी, बेटा ! जिनराजका धर्म आराधन करना । जिससें तेरे पुण्यकी औरभी पुष्टि होगी। पुष्कल धनके मिलनेसें वीरमतीका मन उत्साहित हुआ, उसने भाईके साथ विचार करके विवाहकी कुल सामग्री तयार कराली, लग्नदिनके नजदीक आनेपर वीरमती अपने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034722
Book TitleAbu Jain Mandiro ke Nirmata
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1922
Total Pages134
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy