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________________ जीव-विज्ञान बिना आहार के उपवास तो हैं लेकिन हम सिद्धान्त की दृष्टि से अनाहारक नहीं हैं। सिद्धान्त की दृष्टि से अनाहारक होने का तात्पर्य ही है शरीर को छोड़ देना और आत्मा का शरीर के साथ सम्बन्ध नहीं होना, तब यह जीव (आत्मा) अनाहारक होगा। जिस समय वह किसी भी प्रकार की पुद्गल वर्गणाओं को ग्रहण न करे उस समय यह जीव अनाहारक होगा। आपके शरीर का पोषण प्रतिपल चल रहा है । आपका शरीर आपकी आत्मा के माध्यम से पुष्ट हो रहा है चाहे आप आहार करें अथवा न करें। आप अपने मन, वचन, काय के योगों के माध्यम से पुद्गल वर्गणाओं को ग्रहण कर रहे हैं। आत्मा अपने योग्य पुद्गल वर्गणाओं को ही ग्रहण करके स्थिर हैं। इसलिए जो उपवास करते हैं उनका आहार प्रतिपल चल रहा है। इस तरह आहार भी दो प्रकार का हो जाता है। एक तो वह आहार जो हम इन आहार वर्गणाओं के पोषण के लिए देते हैं जिसे कवलाहार कहते हैं। दूसरा वह आहार जो इसके बिना भी चलता रहता है। जैसे-पंखा चल रहा हैं थोड़ी सी ठंडक हो गई। हमारा शरीर स्वयं ही कहेगा कोई फर्क नहीं पड़ता एक या दो उपवास करने से। क्या हो गया ? शरीर तो वही है लेकिन जब थोड़ी सी गर्मी बढ़ गई तो हमारे मन में ऐसा भाव आ जाता है- 'अरे गर्मी हो रही है। कैसे करूँगा? लेकिन जैसे ही वातावरण में ठंडक हो जाती है, बारिश हो जाती है फिर तो आप एक, दो, तीन, चार, पाँच तक उपवास करते चले जाएंगे। आखिर क्यों? क्योंकि उसमें आपके शरीर के पोषण की मात्रा बढ़ जाती है आपके शरीर में मुख्य रूप से जल की आवश्यकता होती है T और जब वह जलीय तत्व आपको वातावरण से मिल जाते हैं तो आपका शरीर स्वयं ही पुष्ट बना रहता है। आपको उस समय पर न ज्यादा भूख लगती है न ज्यादा प्यास लगती है और कोई परेशानी भी नहीं होती है जिससे आपका शरीर अपने आप उपवास आदि करता चला जाता है। उस समय भी आपका पोषण तो चल रहा है। लेकिन भोजन करने से क्या हो जाता है? भोजन करने से जो शरीर के रूप में मशीन चल रही है उसमें और अधिक क्षमता आ जाती है। यदि भीतर से हम और अधिक क्षमता न डालें, जैसे-गाड़ी में तेल डालना पड़ता है। गाड़ी में तेल नहीं है तो उसकी गति नहीं होगी। यदि पेट्रोल पूरा हैं तो उसकी गति पूरी होगी। इसी तरह से शरीर रूपी गाड़ी में पेट्रोल नहीं होने पर भी आपकी गाड़ी चलती तो रहेगी लेकिन उसमें जो वर्गणाएं आएंगी उन वर्गणाओं को ग्रहण करने की जो क्षमता है उस क्षमता में थोड़ी-सी कमी आ जाएगी । जैसे ही आपने पानी पिया और भोजन इत्यादि किया तो वह योग पुनः प्रारम्भ हो जाएंगे । इसलिए लोग पानी से भी महीने - महीने तक जीवित रह जाते हैं । मन्दसौर में एक सज्जन ने मात्र T पानी पीकर 32 उपवास किये थे। पानी में भी इतनी क्षमता रहती है कि हम इतने लम्बे समय तक भी जीवित रह सकते हैं। क्योंकि पानी से ही हमारा शरीर बहुत कुछ चलता है। उसी के माध्यम से ही इन पुद्गल वर्गणाओं का ग्रहण हो जाता है। इसलिए आप यह भी इस सिद्धान्त ग्रन्थ को पढ़कर समझ लेना कि कोई बात नहीं, हम कवलाहार नहीं कर रहे तो क्या हुआ, हमारा आहार तो चल ही रहा है। इसलिए प्रत्येक जीव जैसे ही उसका जन्म हुआ वह उस समय से लेकर पूरी आयु पर्यन्त आहारक ही रहता है, अनाहारक होता ही नहीं है। चाहे वह सो जाए, चाहे बेहोश हो जाए या उसे 60
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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