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________________ जीव-विज्ञान अर्थ है-पाणी का अर्थ है हाथ और मुक्ता का अर्थ है मोती । आप अपने हाथ में मोती रखें हैं और जब वह मोती गिरेगा तो एक मोड़ या टर्न लेकर वह नीचे गिर जाएगा। इस गति को एक मोड़ा वाली गति कहेंगे इसको समझाने के लिए यहाँ पर पाणीमुक्ता का उदाहरण दिया गया है। दूसरी गति को लांगलिका गति कहते हैं । लांगल हल को कहते हैं । उसमें दो मोड़ बन जाते हैं। इसलिए इसका नाम लांगलिका गति रखा गया है। कुछ जीव ऐसे होते हैं जो दो मोड़े लेकर जन्म लेंगे तो उनकी गति लांगालिका गति कहलाएगी। कुछ जीव ऐसे भी होते हैं जो तीन मोड़ लेकर जन्म लेते हैं। उनकी गति को गोमूत्रिका गति कहते हैं। गाय जब मूत्र करते हुए चली जाती है तो मूत्र का मोड़ बनता चला जाता है। जिसे तीन मोड़ा वाली गति कहते हैं T इस तरह से विग्रह वाली गति तीन प्रकार की हो जाती हैं। पहली गति में एक मोड़ा होगा, दूसरी गति में दो मोड़े होंगे और तीसरी गति में तीन मोड़े होंगे। चौथे समय में तो उस जीव का कहीं न कहीं जन्म हो ही जाएगा। इसलिए यहाँ कहा गया है कि गति चार समय से पहले-पहले ही होती है । आगे के सूत्र में आचार्य अविग्रहवती का समय बता रहे हैं एकसमयाऽविग्रहा | | 29 || अर्थ-मोड़ा रहित (अविग्रहवती) एक समय मात्र की होती है। इसी को ऋजुगति भी कहते हैं। यहाँ पर यह बताया जा रहा है किस गति में कितना समय लगता है? जो अविग्रह वाली गति है वह तो एक समय की हो गई। उसमें तो एक ही समय लगा और उस एक समय में वह जीव बीच में विग्रहगति में नहीं रहने के कारण वह आहारक ही कहलाएगा। यहाँ एक शब्दावली और समझें-एक आहारक होता है और दूसरा अनाहारक होता है। यहाँ आगे के में सूत्र अनाहारक शब्द आने वाला है तो उससे पहले आहारक को समझ लेना चाहिए। आहारक का अर्थ है- जब यह आत्मा शरीर के योग्य नौ-कर्म पुद्गलों को ग्रहण करेगा तो वह आहारक कहलाएगा। जिस समय यह शरीर के योग्य नौकर्म पुद्गलों को ग्रहण नहीं करेगा तब यह अनाहारक कहलाएगा। जब यह शरीर के योग्य पुद्गल वर्गणाओं को ग्रहण करेगा चाहे वह औदारिक हो, वैक्रियक शरीर हो, आहारक शरीर हो, छह प्रकार की पर्याप्तियां होती हैं उनके योग्य पुद्गल वर्गणाएं होती है उन सभी को यह ग्रहण करता है। जब यह तीन शरीर, छह प्रकार की पर्याप्तियों के योग्य पुद्गल परमाणुओं को ग्रहण करेगा तब यह आहारक कहलाएगा। जब यह ग्रहण करना छोड़ देगा केवल कर्म परमाणुओं को ही ग्रहण करेगा तब यह अनाहारक कहलाएगा । उपवास करने वालों को यह विशेष रूप से समझना चाहिए कि हम इस समय आहार तो नहीं कर रहे हैं लेकिन सिद्धान्त की दृष्टि से हम अनाहारक भी नहीं हैं। उपवास में अनाहार तो है अर्थात् 59
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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