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________________ जीव-विज्ञान अथ द्वितीयोऽध्यायः जीव-तत्त्व का वर्णन द्वितीय अध्याय में जीवों के भावों के विषय में और जीव में किस तरह से उन भावों में परिवर्तन होते हुए उनका जन्म इत्यादि होता है, बताया गया है। दूसरे अध्याय में प्रारम्भ के कुछ सूत्रों में भावों का वर्णन है। उसके बाद जीव विज्ञान, शरीर विज्ञान का वर्णन है। हम जो जूलोजी और बायोलोजी पढ़ते हैं उसका अध्ययन जैनदर्शन के तत्त्वार्थसूत्र के दूसरे अध्याय के माध्यम से करेंगे। तत्त्वार्थसूत्र जैनदर्शन का एक महनीय ग्रन्थ है। जैसे सभी दर्शनों की कोई न कोई एक कुंजी होती है उसी प्रकार से जैनदर्शन को समझने के लिए यह तत्त्वार्थ सूत्र एक कुंजी है। इसमें आये हुए सूत्रों को समझने का प्रयास करेंगे तो हम जैनदर्शन की गहराइयों को समझ सकेंगे। औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्व-मौदयिक पारिणामिकौ च ।। 1।। अर्थ-जीव के अपने निज के पाँच असाधारण भाव हैं। जो 1. औपशमिक,2. क्षायिक, 3. मिश्र अथवा क्षायोपशमिक,4. औदयिक,5. पारिणामिक भाव हैं। __इस सूत्र में जीवों के भावों का वर्णन किया जा रहा है। आप सुनते रहते होंगे आपके कैसे भाव हैं आपके कैसे भाव हैं?आप किसी के भावों को कैसे पहचान पाएंगे जब तक आपको जिनवाणी के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है?संसार में सामान्यतः उन भावों को दो भागों में विभाजित कर देते हैं। 1. Positive Emotions -सकारात्मक भाव 2. Negative emotions -नकारात्मक भाव। इन्हीं में यह समस्त संसार चल रहा है। लेकिन जो भीतरी विज्ञान है या जो जीव का विज्ञान है, वह कर्मों के साथ सम्बन्ध रखते हुए किस प्रकार से चलता है, यह हमें जैनदर्शन पढ़कर ही समझ आएगा। आचार्य कहते हैं 'जीवस्य स्वतत्त्वम् जीव का स्वतत्त्व, तत्त्व अर्थात् जीव के अपने जो भाव हैं। जीव के अपने भावों को यहाँ जीव का 'स्वतत्त्व' कहा गया है। ये जो भाव हैं वे जीव के एक प्रकार के नहीं है बल्कि पाँच हैं। इसीलिए आचार्य पाँच प्रकार के भावों का वर्णन करने जा रहे हैं। सबसे पहला है औपशमिक भाव, दूसरा है क्षायिक भाव, तीसरा है मिश्र भाव, चौथा है औदयिक भाव और पाँचवाँ है पारिणामिक भाव | जीव के ये पाँच प्रकार के भाव हैं। ये भाव ही उसके स्वतत्व हैं अर्थात् ये भाव जीव में उत्पन्न हो रहे हैं। इसलिए इनको जीव का ही स्वतत्त्व कहा गया है। ये परतत्त्व नहीं हैं बल्कि ये स्वतत्त्व हैं। स्व का अर्थ है, जीव के अलावा ये भाव कोई और कर नहीं सकेगा। अर्थात् जीव के अतिरिक्त ये भाव किसी अन्य में उत्पन्न भी नहीं होंगे इसलिए यहाँ पर "जीवस्य स्वतत्त्वं' यह कहा गया है। शंका- यहाँ पर औपशमिक भाव को ही पहले क्यों रखा गया है? 5
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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