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________________ जीव-विज्ञान उसमें त्रस जीव हो सकते हैं। अमर्यादित दूध से दही बनता है तो उसे आचार्यों ने अभक्ष्य कहा है। उसे जीव वाला कहा है। यदि वह दही मर्यादित दूध से बना है तो उसमें किसी भी जीवों की उत्पत्ति नहीं होकर ही दही बनता है। इसलिए कई बार पढ़ने लिखने वाले बच्चों के लिए एक विषय बन जाता है। क्या इसमें जीव हैं?या यह जीव से रहित है। आचार्य कहते हैं-यह प्रक्रिया एक Chemical Process है। दूध से दही बनने में जो भी process होता है वह एक Chemistry है। यदि वह शुद्ध दूध है तो उसमें किसी भी प्रकार से जीवों की उत्पत्ति नहीं होती है। विज्ञान चाहे कुछ भी कहे आपको यह समझना है कि इसमें किसी भी प्रकार के जीवों की उत्पत्ति नहीं होती है। वह दही मर्यादित है तो उसमें जीव नहीं होंगे अगर अमर्यादित है तो बात अलग है। आचार्य तो सभी बातों का ध्यान रखते हैं। उन्होंने बताया है इतने समय तक आप उसको रखेंगे तो वह मर्यादित रहेगा। वे तो प्रत्येक चीज की मर्यादा बताते हैं। यह इतना बड़ा विज्ञान है जिसे आज का विज्ञान चाहे कितनी भी खोज कर ले परन्तु वह नहीं बता सकता जो हमारे आचार्यों ने हमें बताया है। अब वह धीरे-धीरे इस बात को मानने लगा है जिन चीजों में मर्यादाएँ होती है, अगर उन मर्यादाओं से बाहर जाते हैं तो उसमें अलग प्रकार के परिवर्तन होने लग जाते हैं। उसमें रूपान्तरण होने लग जाते हैं। वर्ण से वर्णान्तर, रस से रसान्तर , अर्थात् उसमें जीवों की उत्पत्ति हो जाती है। यह जैन-विज्ञान आज भी सिद्ध होता है चाहे आज का साइंस इसे सिद्ध न कर पाए। इसलिए हमेशा ध्यान रखना कि पृथ्वी में, जल में, अग्नि में, वायु में और वनस्पतियों में एकेन्द्रिय जीव हैं। कुछ लोग कुतर्क करते हैं-आप वनस्पति खाते हैं और हम माँस खाते हैं इसमें क्या अन्तर है? आज के बच्चों को स्कूलों में ज्यादातर इस प्रकार के प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। जो एकेन्द्रिय जीव होते हैं उनमें कभी भी माँस नहीं होता है। उनके जो शरीर होते हैं वे एकेन्द्रिय शरीर के माध्यम से इस तरह के बने होते हैं कि जहाँ पर पृथ्वी, जल, वायु है। वे उसी में जन्म ले लेते हैं और उसी में से निकलते चले जाते हैं। उनके शरीर में कभी भी हड्डी, रक्त, माँस नहीं होता है। जिनमें ये चीजें पाई जायें उसे माँस कहते हैं। वनस्पतियों में कभी भी हड्डियाँ नहीं होती, उसमें रक्त नहीं होता, जो सात धातुएं त्रसों में बनती है वह भी उनमें नहीं मिलेंगी। इसलिए वनस्पतियों की तुलना माँस से नहीं हो सकती। एकेन्द्रिय जीव कहने मात्र से वह माँस नहीं हो गया। उसमें जीव है लेकिन वह निकल गया। यही पद्धति भोजन में भी बताई गई है। यदि आपके भोजन में त्रस जीव आ जाए तो भोजन को छोड़ देना चाहिए। क्योंकि वह भोजन अशुद्ध हो गया क्योंकि उस जीव में जो रक्त, माँस इत्यादि होगा उससे उसका सम्पर्क हो गया। वह भोजन अब हमें नहीं करना चाहिए। यह उसके पीछे का तर्क संगत कारण है। एकेन्द्रिय जीव से कभी भी भोजन में अशुद्धि नहीं होती है। एकेन्द्रिय भी उसी तरह से हैं जैसे हम श्वांस ले रहे हैं। जैसे श्वांस के बिना हमारा जीवन नहीं चल सकता उसी तरह पृथ्वी, जल, वायु, वनस्पति के बिना भी हमारा जीवन नहीं चल सकता। जबकि त्रस की हिंसा के बिना हमारा जीवन चल सकता है। यह बहुत बड़ा अन्तर है और इस अन्तर को वैज्ञानिक नहीं समझेंगे, आप न उनको समझा पाएंगे और न आप कभी यह विश्वास कर पाएंगे कि ये क्या कह रहे 40
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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