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________________ जीव-विज्ञान तात्पर्य-उनको समझाया नहीं जा सकेगा, उनको सुनाया नहीं जा सकेगा अगर वे सुनने भी लगेंगे तो सुनकर वे विचार अपने मन के अंदर नहीं रख पाएंगे। जैसे-ऐसा करना है, ऐसा करने से ऐसा होता है। इस प्रकार की समझ, इस प्रकार के विचार मन वालों के पास ही रहते हैं। बिना मन वाले जीवों के अंदर क्या चलता है? भाव चलता है। चीटी है, चीटें है, कीड़े-मकोड़े हैं ये भी अपना बचाव करते हैं, ये भी अपना जीवन जीना चाहते हैं। कहाँ पर खतरा है यह इनको मालूम रहता है और ये अपने जीवन को बचाने के लिए अनेक प्रकार के प्रयास भी करते हैं। तो यह सब किससे चलता है? मन से नहीं चलता आपको आगे अभी बताया जाएगा इनमें मन नहीं है। ये अमनस्क जीव हैं। मन से रहित जीवों में भी ये परिणतियाँ क्यों हैं? एकेन्द्रिय जीवों में भाव क्यों आ जाते हैं? उनके अंदर कर्मबंध क्यों होते रहते हैं? उनको कर्म बंध कराने के लिए कौन प्रेरित करता है? ये भावात्मक परिणतियाँ जो आपने पहले पढ़ी हैं ये सब उनमें पड़ी रहती हैं। उनके अंदर भी यह क्षयोपशम ज्ञान का भाव हैं मतिज्ञान, श्रुतज्ञान । छोटा है, थोड़ा है लेकिन उनके अंदर है। और उसी भावात्मक परिणति के कारण उनका जीवन चलता है। उस ज्ञान के उपयोग से ही वे अपने आपको बचा लेंगे। आपने देखा होगा चींटी चली जा रही है और जैसे ही पानी आया उसका मुँह स्वतः मुड़ जाएगा। जैसे ही उसको कुछ आभास हुआ। ऐसे भी जीव प्रायः देखने में आते हैं जो सामने चल रहे होंगे या उड़ रहे होंगे और जैसे ही उन्हें कुछ आहट हुई कि आपका पैर उनसे 10से.मी. दूर भी है तो वह वहीं से मुड़ जाएंगे, वहीं के वहीं वह जीव ठहर जाएगा। वह जीव ऐसे ठहर जाएगा कि आपको पता ही नहीं लगेगा कि यहाँ पर कोई जीव है। जब वह विश्वस्त हो जाएगा कि यहाँ पर कुछ नहीं है तो वह फिर से चलने लग जाएगा। यह सब क्या है? यह उनके अंदर का विचार नहीं है, मन नहीं है यह उनके अंदर भाव चल रहा है। इसे कहते हैं क्षयोपशम भाव । इस ज्ञान के क्षयोपशम भाव से उनकी ये परिणतियाँ चल रही हैं। आपके अन्दर भाव से नहीं चलती। क्योंकि भाव तो आपके अन्दर एक तरह से गौण हो गया। आपका मन हो जाता है तो आपकी सभी परिणतियाँ मन से चलती है। आपको अपने भावों की पहिचान इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि मन हमारे ऊपर हावी रहता है। विचार हमारे ऊपर हावी रहते हैं। इसलिए आप उस भाव तक नहीं पहुँच पाएंगे और जो ये अमनस्क जीव हैं उनमें भाव की प्रधानता रहती है। इसलिए जब आप चलते हो तो आपको चौराहों पर अनेक प्रकार की लाईट लगानी पड़ती है। आपको विचार देने के लिए आपके ज्ञान को बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के बाहरी उपाय करने पड़ते हैं। तब आपका मन अलर्ट होता है और इन जीवों का मन अपने ही भावों से अलर्ट हो जाता है, इन्हें किसी भी प्रकार के विचार देने की जरूरत नहीं पड़ती। ये बाहरी आहट मिलते ही अपने आपको संभाल लेते हैं। आप कभी इन जीवों को देखना इनमें मन नहीं होते हुए भी इनका ज्ञान काम करता रहता है। इसलिए इनके अंदर वह ज्ञान तो है लेकिन आपकी तरह मन की वैचारिक परिणति नहीं है इसलिए इनमें भावों की प्रधानता है, इनमें भाव विज्ञान चलता है और आप भावों तक पहुँच नहीं पाते क्योंकि आपका मन विचारों में उलझा देता है। इसलिए यहाँ पर समनस्क और अमनस्क दो प्रकार के जीव बताए गए हैं। जिनमें मन है तो वे विचार करेंगे उसके बिना रह नहीं सकते। जिनमें मन नहीं है तो उनका जीवन कैसे चलेगा? तो बिना विचार के चलेगा इसलिए वे 36
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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